------------गज़ल--------------
बसंत बहार चारों और छाई है,
कामदेव ने भी ली आज अंगड़ाई है।
पृकृति कैसी दुल्हन की तरह सजी,
प्रेम के अक्षर भी तो प्यारे ढाई हैं।
मौसम ने देखो कैसे रंग-रूप बदला,
धरती ने हरी-भरी चादर बिछाई है।
मैं तुझ में समा जाऊं तू मुझ में समा,
रंग रलना मना लें प्रेम ऋतु आई है !
अब छोड़ भी दे दामन तू पतझड़ का,
'फलक' ने फूलों से ही डगर सजाई है!
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-कृष्णकांत भाटिया 'फलक'
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