ग़ज़ल
आज इतना सन्नाटा क्यों है ?
कोई मुझे जगाता क्यों है !
सिकुड़ी सिकुड़ी सी बीती रात,
ये सवेरा भी सताता क्यों है ?
चला गया किसी के घर का नूर,
रब भी यूँ रुलाता क्यों है ?
जीवन है तो मृत्यु भी है यहाँ ,
बनानेवाला ही मिटाता क्यों है ?
बता कुछ तो हमें ऐ जिंदगानी,
ये अँधेरा छा जाता क्यों है ?
पलने में झुलाया लोरी गा कर,
उसे चिता पर सुलाता क्यों है ?
इक कमरे का छोटा सा घर है,
वक्त खुशियाँ चुराता क्यों है ?
***
-'कान्त '
आज इतना सन्नाटा क्यों है ?
कोई मुझे जगाता क्यों है !
सिकुड़ी सिकुड़ी सी बीती रात,
ये सवेरा भी सताता क्यों है ?
चला गया किसी के घर का नूर,
रब भी यूँ रुलाता क्यों है ?
जीवन है तो मृत्यु भी है यहाँ ,
बनानेवाला ही मिटाता क्यों है ?
बता कुछ तो हमें ऐ जिंदगानी,
ये अँधेरा छा जाता क्यों है ?
पलने में झुलाया लोरी गा कर,
उसे चिता पर सुलाता क्यों है ?
इक कमरे का छोटा सा घर है,
वक्त खुशियाँ चुराता क्यों है ?
***
-'कान्त '