Tuesday, 3 November 2015

ग़ज़ल 

गज़ब  है  वो  निगाहों  से वार  करते  हैं ,
खुदा  कसम  दिल  तार  तार   करते  हैं। 

हमारी  बात  पर  खफ़ा  तो   नहीं   होते,
फिर भी हर  बात  पर तकरार  करते  हैं। 

सपने  हकीक़त  बनने  आये हैं  दर  पर,
तभी  वे  नींद   का  बेड़ा   पार  करते  हैं। 

सफ़र  में  तो  मुश्किलें  आती -जाती  हैं ,
वे  साथ चलने  से  ही  इन्कार करते  हैं। 

गुज़र  रहे  हैं  इश्क़  के  ऐसे  मुकाम  से,
हम  हर शाम उनका इन्तज़ार करते   हैं। 

खुद  की  बदखामियों   से डरते   हैं  हम,
वे   बारबार   हमारा  इम्तहान  करते  हैं। 

मछलियाँ   झुलस   जाती  हैं  झील   की,
उसमें  तैरकर  जब   वे  हमाम  करते  हैं। 
                           ***
-'कान्त'

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