माँ
मैं अपने गाँव के पुराने घर
के आँगन में खड़ा हूँ।
मुझे मेरी माँ के कदमों की
आहट सुनाई देती है।
'देख बेटा , ' तुलसी सूख गई है
मीठा नीम कडुआ हो गया।
यहाँ हम गाय बाँधते थे ना.... !
तुम्हें याद है ?
बकरी के मिमयाने की आवाज़ अब
कहाँ है ?
तुझे तो बकरी के दूध की चाय ही
अच्छी लगती थी ना !'
मेरे कानों में हजारों घंटियाँ बजने
लगती हैं...... !
झूमने लगता है मेरा बचपन,
एक के बाद एक दृश्य घेर लेते हैं मुझे !
सुनाई देते हैं तड़के नींद में
माँ के सुरीले कंठ से सुने भजन !
छाछ मंथन की गतिशील प्रक्रिया,
झंझोड़ के रख देती है मेरे पूरे जेहन को !
मक्खन का जायका भिगो देता है मेरे होठों को !
मेरी पीठ पर स्पर्श होता है
माँ के हाथों का ....
मैं आकुल-व्याकुल हो जाता हूँ !
घर के दरवाजे की सिकड़ी बंध करता हूँ,
तुलसी की डालियों के सूखे पत्ते ....
एक के बाद एक झड़ने लगते हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
मैं अपने गाँव के पुराने घर
के आँगन में खड़ा हूँ।
मुझे मेरी माँ के कदमों की
आहट सुनाई देती है।
'देख बेटा , ' तुलसी सूख गई है
मीठा नीम कडुआ हो गया।
यहाँ हम गाय बाँधते थे ना.... !
तुम्हें याद है ?
बकरी के मिमयाने की आवाज़ अब
कहाँ है ?
तुझे तो बकरी के दूध की चाय ही
अच्छी लगती थी ना !'
मेरे कानों में हजारों घंटियाँ बजने
लगती हैं...... !
झूमने लगता है मेरा बचपन,
एक के बाद एक दृश्य घेर लेते हैं मुझे !
सुनाई देते हैं तड़के नींद में
माँ के सुरीले कंठ से सुने भजन !
छाछ मंथन की गतिशील प्रक्रिया,
झंझोड़ के रख देती है मेरे पूरे जेहन को !
मक्खन का जायका भिगो देता है मेरे होठों को !
मेरी पीठ पर स्पर्श होता है
माँ के हाथों का ....
मैं आकुल-व्याकुल हो जाता हूँ !
घर के दरवाजे की सिकड़ी बंध करता हूँ,
तुलसी की डालियों के सूखे पत्ते ....
एक के बाद एक झड़ने लगते हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '