बादल
अय काले घनेरे बादल
बारिश से भरे आसमान में ,
तेरी इंद्रधनुषी बारात निकल रही है !
लगता है कहीं पर तू बरसा है जरूर।
तेरे साथ सेंकडों पालकियाँ हैं ,
जिन में चपलांगनाएँ सवार हैं।
अषाढ़ी दूज बीत जाने के बाद
आज फिर आश बंधी है,
कि तू उमड़घुमड़कर बरसेगा।
रंग-बिरंगी संध्याकी ,
अनगनित ध्वजाएँ हैं नील गगन में।
सर्वत्र इन्तज़ार है तेरे आनेका
मेरा सूखा पड़ा हमीरसर भी ,
तेरी बूंदों से छलकना चाहता है।
अय काले घनेरे बादल
आसमान में दहाड़ना शुरू कर ,
बरसना शुरू कर।
हमें भीगना है बारिश में ,
बाराती बनकर नाचना है।
सूखी धरती को हरी-भरी देखना है,
इसलिए बस अब तू बरस,
सारे बाँध तोड़कर बरस !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
अय काले घनेरे बादल
बारिश से भरे आसमान में ,
तेरी इंद्रधनुषी बारात निकल रही है !
लगता है कहीं पर तू बरसा है जरूर।
तेरे साथ सेंकडों पालकियाँ हैं ,
जिन में चपलांगनाएँ सवार हैं।
अषाढ़ी दूज बीत जाने के बाद
आज फिर आश बंधी है,
कि तू उमड़घुमड़कर बरसेगा।
रंग-बिरंगी संध्याकी ,
अनगनित ध्वजाएँ हैं नील गगन में।
सर्वत्र इन्तज़ार है तेरे आनेका
मेरा सूखा पड़ा हमीरसर भी ,
तेरी बूंदों से छलकना चाहता है।
अय काले घनेरे बादल
आसमान में दहाड़ना शुरू कर ,
बरसना शुरू कर।
हमें भीगना है बारिश में ,
बाराती बनकर नाचना है।
सूखी धरती को हरी-भरी देखना है,
इसलिए बस अब तू बरस,
सारे बाँध तोड़कर बरस !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '