गीत
मन का पंछी दूर गगन से टोह लगाता आया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
नदियाँ देखीं , परबत ढूंढे , रत्नाकर भी आए,
लाख इशारे आने के पर मुझको वे न भाए.
चिड़िया आई,बोली किसने ये अनुराग जगाया रे ?
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
कैसी गांठें बंधी थीं , जो खुलने ही न पाईं ,
रंगत कैसी युग बीते, फिर भी धुलने न पाई.
अंतरपट पर मीत किसीने गहरा रंग लगाया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
अब वर्षा का राज़ खुलेगा ,प्रकृति के बागों में,
जब धरती की कोख फलेगी,रंग लगेगा धागों में.
हर बसंत पर लुटना ,तुम्हीं ने तो सिखलाया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
तुम पनपो ओ कली, हमारी लाख दुआएं ले लेना,
आँधी हो या बारिश, सब कुछ तुम सह लेना.
अब घोर अँधरे में भी, हमने एक सितारा पाया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
मन का पंछी दूर गगन से टोह लगाता आया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
नदियाँ देखीं , परबत ढूंढे , रत्नाकर भी आए,
लाख इशारे आने के पर मुझको वे न भाए.
चिड़िया आई,बोली किसने ये अनुराग जगाया रे ?
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
कैसी गांठें बंधी थीं , जो खुलने ही न पाईं ,
रंगत कैसी युग बीते, फिर भी धुलने न पाई.
अंतरपट पर मीत किसीने गहरा रंग लगाया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
अब वर्षा का राज़ खुलेगा ,प्रकृति के बागों में,
जब धरती की कोख फलेगी,रंग लगेगा धागों में.
हर बसंत पर लुटना ,तुम्हीं ने तो सिखलाया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
तुम पनपो ओ कली, हमारी लाख दुआएं ले लेना,
आँधी हो या बारिश, सब कुछ तुम सह लेना.
अब घोर अँधरे में भी, हमने एक सितारा पाया रे,
इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसीने गाया रे.
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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