Thursday, 29 June 2017

बादल 

अय  काले  घनेरे  बादल 
बारिश  से भरे आसमान में ,
तेरी  इंद्रधनुषी  बारात  निकल  रही है !
लगता  है  कहीं  पर  तू  बरसा  है  जरूर। 
तेरे  साथ  सेंकडों  पालकियाँ  हैं ,
जिन में  चपलांगनाएँ  सवार  हैं। 
अषाढ़ी दूज  बीत  जाने  के बाद 
आज  फिर  आश  बंधी  है,
कि  तू  उमड़घुमड़कर  बरसेगा। 
रंग-बिरंगी संध्याकी ,
अनगनित ध्वजाएँ  हैं नील गगन में।  
सर्वत्र  इन्तज़ार  है  तेरे  आनेका
मेरा  सूखा  पड़ा  हमीरसर भी ,
तेरी  बूंदों  से छलकना  चाहता  है। 
अय  काले  घनेरे  बादल
आसमान  में  दहाड़ना  शुरू  कर ,
बरसना  शुरू कर। 
हमें  भीगना  है  बारिश में ,
बाराती  बनकर नाचना है। 
सूखी धरती को हरी-भरी  देखना है,
इसलिए  बस  अब  तू  बरस,
सारे  बाँध तोड़कर बरस !
                   ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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