Thursday, 19 October 2017

ग़ज़ल 

नए   सालकी  प्रीत   मुबारक,
मिलने  की  ये  रीत  मुबारक। 

कवि  मिलन  के हर मंच पर ,
तुम्हें तुम्हारी  जीत मुबारक। 

अक़्सर अपनी तन्हाइयों  में ,
इक प्यारा सा मीत  मुबारक। 

बर्फ़ीले मौसम में होता रहे यूँ,
हा हा हू हू  की  शीत मुबारक। 

नूतनता की  इस महफ़िल में ,
दोस्तो सब को गीत मुबारक। 
                  ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '





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