Tuesday, 25 February 2020

बैठो  !

अपने   आप   से  नजरें  मिला  शकते  हो,  तो  बैठो  !
किसी  मासूम  को  गले  लगा  शकते  हो , तो  बैठो  !

आईना   हमेशा   सच   बोलता   है , तुम्हें    देखकर ,
परछांई    को    यकीन   दिला  शकते  हो,  तो  बैठो। 

सच  कभी  कड़वा  नहीं   होता,सच -सच   होता   है,
ज़मीर को  सच की राह पर चला शकते हो, तो बैठो। 

सौदामनी  चमकती    है, तब    बादल  गरजते    हैं ,
बरसती  बूंदो  में  गुल  खिला  शकते   हो,  तो  बैठो। 

इंसानियत  ही  पहचान  है -जान   है  इन्सान   की ,
अपने भीतर के  जानवर को डरा  शकते हो,तो बैठो। 

माना कि,  ये     रंजिशें  रात   भर   सोनें   नहीं देतीं,
सारे   गिले -शिकवे तुम  भुला  शकते  हो , तो  बैठो। 

फगुआ  बेसबरी  से  इंतझार  कर  रहा   है  तुम्हारा,
फ़ागुन  में  रंगों  की   होली  रचा  शकते हो,तो बैठो. 
                                   ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '




No comments:

Post a Comment