बैठो !
अपने आप से नजरें मिला शकते हो, तो बैठो !
किसी मासूम को गले लगा शकते हो , तो बैठो !
आईना हमेशा सच बोलता है , तुम्हें देखकर ,
परछांई को यकीन दिला शकते हो, तो बैठो।
सच कभी कड़वा नहीं होता,सच -सच होता है,
ज़मीर को सच की राह पर चला शकते हो, तो बैठो।
सौदामनी चमकती है, तब बादल गरजते हैं ,
बरसती बूंदो में गुल खिला शकते हो, तो बैठो।
इंसानियत ही पहचान है -जान है इन्सान की ,
अपने भीतर के जानवर को डरा शकते हो,तो बैठो।
माना कि, ये रंजिशें रात भर सोनें नहीं देतीं,
सारे गिले -शिकवे तुम भुला शकते हो , तो बैठो।
फगुआ बेसबरी से इंतझार कर रहा है तुम्हारा,
फ़ागुन में रंगों की होली रचा शकते हो,तो बैठो.
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
अपने आप से नजरें मिला शकते हो, तो बैठो !
किसी मासूम को गले लगा शकते हो , तो बैठो !
आईना हमेशा सच बोलता है , तुम्हें देखकर ,
परछांई को यकीन दिला शकते हो, तो बैठो।
सच कभी कड़वा नहीं होता,सच -सच होता है,
ज़मीर को सच की राह पर चला शकते हो, तो बैठो।
सौदामनी चमकती है, तब बादल गरजते हैं ,
बरसती बूंदो में गुल खिला शकते हो, तो बैठो।
इंसानियत ही पहचान है -जान है इन्सान की ,
अपने भीतर के जानवर को डरा शकते हो,तो बैठो।
माना कि, ये रंजिशें रात भर सोनें नहीं देतीं,
सारे गिले -शिकवे तुम भुला शकते हो , तो बैठो।
फगुआ बेसबरी से इंतझार कर रहा है तुम्हारा,
फ़ागुन में रंगों की होली रचा शकते हो,तो बैठो.
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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