वंदन
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे,
जीवंत प्रेरणा के तुम यज्ञ कुंड रे.
युग युग के पूण्य की तुम
स्वातंत्र्य अर्चना हो
शोषित जनों के अंतिम निश्चय प्रचंड रे ,
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे.
जब भी जली शमाएँ
कम भी न थे पतंगे.
मेरी परंपरा की ज्योति अखंड रे.
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे.
नव जागरण की बेला
कि स्वप्न हों उजागर
साकार कल्पना के तुम मेरुदंड रे.
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे.
हम सत्य के पथिक हैं
श्रद्धा के दण्ड तुम हो
जागृत रहे हमारी निष्ठा अनंत रे .
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे,
जीवंत प्रेरणा के तुम यज्ञ कुंड रे.
युग युग के पूण्य की तुम
स्वातंत्र्य अर्चना हो
शोषित जनों के अंतिम निश्चय प्रचंड रे ,
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे.
जब भी जली शमाएँ
कम भी न थे पतंगे.
मेरी परंपरा की ज्योति अखंड रे.
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे.
नव जागरण की बेला
कि स्वप्न हों उजागर
साकार कल्पना के तुम मेरुदंड रे.
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे.
हम सत्य के पथिक हैं
श्रद्धा के दण्ड तुम हो
जागृत रहे हमारी निष्ठा अनंत रे .
वंदन मेरी आस्था के आधार स्तंभ रे
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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