होली !
(राग-मालकौंश)
सखीरी सब जन खेले होली,
गंगाधर शिर नीर निचोवे ,
भीगे प्रेमल गौरी !
नटखट नटवर रंग उड़ाएँ ,
प्रसन्न व्रजकी छोरी !
सखीरी सब जन खेले होली !
अंतरमें रंग बरसाके ,
खेले खेल वियोगी !
आनंद भयो-आनंद भयो ,
होरी के बाण चलाकर ,
मदन करे शिरजोरी !
सखीरी सब जन खेले होरी !
संसारी मदमस्त बने,
भंग पी करे सीनाजोरी !
नशे में चकचूर हो रागी,
'कान्त' बसंत पे पागल !
पकड़े दामन उसका चोरी चोरी,
सखी रे सब जन खेले होली !
***
-'कान्त'
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