Saturday, 21 December 2019

अटलजी  !

अटलजी ने    जहाँ    व्यासपीठ   जमाई  थी ,
गीत -ग़ज़ल    में कथा   राष्ट्र  की सुनाई थी ! 

सभी   सवालों   को  अपनी मुट्ठी  में दबाकर ,
देश   की    जनता  को      ढाढ़स  बँधाई  थी !

अँधेरा    भी   सदा    रास   आया  था   उन्हें,
राष्ट्र पथ   पर  ,  दीपमालाएँ    सजाईं    थी  !

चाँद   भी    सिकुड़ा,  राहु  ने  भी  डेरा  डाला,
मौसम चाहे जैसे चला,कदमो में सच्चाई थी !

फड़फड़ाए  पंख  जब किसी ज़ख़्मी परिंदे  के,
उसकी वेदना -शब्दों  से  जहां  को सुनाई थी।  

वाजपेयी के अल्फ़ाज़ से शीत -अंगारे  बरसे,
काँटों  और फूलों ,दोनों से दोस्ती निभाई थी !

रात  डराती -पथ  उबड़-खाबड़-दिया न बाती ,
उनकी   सोच   में  महासागर सी  गहराई  थी !
                                ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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