अटलजी !
अटलजी ने जहाँ व्यासपीठ जमाई थी ,
गीत -ग़ज़ल में कथा राष्ट्र की सुनाई थी !
सभी सवालों को अपनी मुट्ठी में दबाकर ,
देश की जनता को ढाढ़स बँधाई थी !
अँधेरा भी सदा रास आया था उन्हें,
राष्ट्र पथ पर , दीपमालाएँ सजाईं थी !
चाँद भी सिकुड़ा, राहु ने भी डेरा डाला,
मौसम चाहे जैसे चला,कदमो में सच्चाई थी !
फड़फड़ाए पंख जब किसी ज़ख़्मी परिंदे के,
उसकी वेदना -शब्दों से जहां को सुनाई थी।
वाजपेयी के अल्फ़ाज़ से शीत -अंगारे बरसे,
काँटों और फूलों ,दोनों से दोस्ती निभाई थी !
रात डराती -पथ उबड़-खाबड़-दिया न बाती ,
उनकी सोच में महासागर सी गहराई थी !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
अटलजी ने जहाँ व्यासपीठ जमाई थी ,
गीत -ग़ज़ल में कथा राष्ट्र की सुनाई थी !
सभी सवालों को अपनी मुट्ठी में दबाकर ,
देश की जनता को ढाढ़स बँधाई थी !
अँधेरा भी सदा रास आया था उन्हें,
राष्ट्र पथ पर , दीपमालाएँ सजाईं थी !
चाँद भी सिकुड़ा, राहु ने भी डेरा डाला,
मौसम चाहे जैसे चला,कदमो में सच्चाई थी !
फड़फड़ाए पंख जब किसी ज़ख़्मी परिंदे के,
उसकी वेदना -शब्दों से जहां को सुनाई थी।
वाजपेयी के अल्फ़ाज़ से शीत -अंगारे बरसे,
काँटों और फूलों ,दोनों से दोस्ती निभाई थी !
रात डराती -पथ उबड़-खाबड़-दिया न बाती ,
उनकी सोच में महासागर सी गहराई थी !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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