Sunday, 22 December 2019



 ग़ज़ल 

सच  बोलना भी  है,जीना भी है,
मयखाने में  जा के,पीना भी है। 

झुकना  नहीं किसी  के सामने,
देखो, छप्पन  का  सीना भी है। 

सरल नहीं है ,रंग का निखरना,
पथ्थर पे  पिसती ,हीना  भी है। 

सड़क भी पिघलती है साँसों से,
किसीका मज़हब पसीना भी है। 

चाँद  तारे  यूँ  ही  नहीं चमकते ,
आसमाँ में  छिपा नगीना भी है। 

कैसे सुकून पाऊँ ,धुकधुकी  में ?
करिश्मा के साथ करीना भी है। 

बड़े नाज़  से  कदम  रख दूँ मैं ,
मक्का  भी  यहीं,मदीना भी है। 
                ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '


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