…… तिरंगे तू फरक !
आज मिट्टी का कण -कण ,
मुझे अपने पास बुलाता !
मेरे प्यारे तिरंगे तू फरक ,
ये मस्तक ऊँचे उठ जाता !
पवन झंकार चुराये युँ दौड़े,
दो पीढ़ीयोंको ये साथ जोड़े !
तीन रंगों में तू बड़ा सुहाता,
तेरा ये रूप मुझे है भाता !
नदियों की जलधारा बहती,
पल भर भी खड़ी न रहती !
'कान्त ' तेरे ही चरणों में,
ज़न्नतका सुख मिल पाता !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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आज मिट्टी का कण -कण ,
मुझे अपने पास बुलाता !
मेरे प्यारे तिरंगे तू फरक ,
ये मस्तक ऊँचे उठ जाता !
पवन झंकार चुराये युँ दौड़े,
दो पीढ़ीयोंको ये साथ जोड़े !
तीन रंगों में तू बड़ा सुहाता,
तेरा ये रूप मुझे है भाता !
नदियों की जलधारा बहती,
पल भर भी खड़ी न रहती !
'कान्त ' तेरे ही चरणों में,
ज़न्नतका सुख मिल पाता !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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