ग़ज़ल !
आ आ भी जा मिल लें हम,
हमारी रंजिशें तो हों कम !
हमारे ताल्लुक़ में गम नहीं ,
इश्कका चल भर लें दम !
आँसू कभी रुकने वाले नहीं ,
छोड़ दें हम दोनों ये भरम !
और कुछ रोज बोझ उठा लें ,
चल छोड़ दें सारी ये शरम !
मुक्क़दर तो हमारा देखिये,
इसी वक़्त याद आया धरम !
चाँद ज्यादा रोशन है अभी,
सूरज का देखा नहीं करम !
दुश्मनी है तो तू जमके कर,
या तू आ जा हमारे हरम !
***
-'कान्त '
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