ग़ज़ल
लोग मेरे साये में आराम फ़रमाते रहे,
मौका मिला तो वे ही मुझे सताते रहे !
मैं इन्सान होने की सज़ा पाता रहा,
हिफ़ाज़त करने वाले ही, गिराते रहे !
जिन्दगी में इससे पहले ,सन्नाटा न था,
हँसना सिखाया था , वो ही रुलाते रहे !
आज़ दिल भी धड़कता है तो डर जाता हूँ ,
बेवज़ह वे मेरे आँगन में चिल्लाते रहे !
बता कुछ तो हमें ,अय बेवफ़ा जिंदगानी ,
अक्सर गम के साये ही,क्यों बुलाते रहे ?
बिकते दिल के कोने में, कोई गम न था,
वे तो बीच बाज़ार में, बोली लगाते रहे !
हर कदम देते रहे ईमानदारी का सबूत,
बेईमानी से ही वे हमें मिटाते रहे !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
लोग मेरे साये में आराम फ़रमाते रहे,
मौका मिला तो वे ही मुझे सताते रहे !
मैं इन्सान होने की सज़ा पाता रहा,
हिफ़ाज़त करने वाले ही, गिराते रहे !
जिन्दगी में इससे पहले ,सन्नाटा न था,
हँसना सिखाया था , वो ही रुलाते रहे !
आज़ दिल भी धड़कता है तो डर जाता हूँ ,
बेवज़ह वे मेरे आँगन में चिल्लाते रहे !
बता कुछ तो हमें ,अय बेवफ़ा जिंदगानी ,
अक्सर गम के साये ही,क्यों बुलाते रहे ?
बिकते दिल के कोने में, कोई गम न था,
वे तो बीच बाज़ार में, बोली लगाते रहे !
हर कदम देते रहे ईमानदारी का सबूत,
बेईमानी से ही वे हमें मिटाते रहे !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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