ग़ज़ल
ज़िंदगी के हर लमहे का लुत्फ़ उठाये रख्खा ,
मोत आई तो उसे बातों में उलझाये रख्खा !
इक सन्नाटा सा उभरा इस सारे जहान में ,
चीर कर ख़ामोशी गीतों को हमने गाये रख्खा !
शब्दों के कफ़स में सदियों से बंध हैं हम ,
फ़िक्रे रिहाई को हमने हरदम भगाये रख्खा !
ये सच है कि फूलों से मुहब्बत है हमको ,
फिर भी काँटों को सीने से लगाये रख्खा !
ये कैसी तूफानी हवा चली है गुलिस्ताँ में ,
आँधियों में भी गुलशन को बचाये रख्खा !
माँगी न कभी परवरदिगार से हँसी हमने,
आँसू ओंको पलकों पर सदा सजाये रख्खा !
सब अजनबी हैं आज हमारी महफ़िल में ,
साकी बनकर 'कान्त 'गज़ल को पिलाये रख्खा !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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