ग़ज़ल
दिल तोड़ना न था तोड़ना पड़ा,
रिश्ता जोड़ना न था जोड़ना पड़ा !
वे नज़र आये आँसू के क़तरे में,
कुछ बोलना न था बोलना पड़ा !
छिपाए हमने राज़ अपने भीतर,
दिल खोलना न था खोलना पड़ा !
थीं अभी तक जो कुँवारी चिट्ठियाँ
देने दौड़ना न था दौड़ना पड़ा !
उनके होठों में दबी आवाज़ हूँ मैं ,
कुछ छोड़ना न था छोड़ना पड़ा !
--------------------------------------
-कृष्णकान्त भाटिया 'कान्त '
+++++++++++++++++++
No comments:
Post a Comment