Thursday, 18 September 2014

 ग़ज़ल 

दिल   तोड़ना  न था  तोड़ना  पड़ा,
रिश्ता जोड़ना न था  जोड़ना  पड़ा !

वे  नज़र आये  आँसू  के  क़तरे  में,
कुछ  बोलना  न था   बोलना  पड़ा  !

छिपाए  हमने  राज़  अपने  भीतर,
दिल  खोलना  न था  खोलना  पड़ा !

थीं अभी तक जो  कुँवारी  चिट्ठियाँ  
देने  दौड़ना  न था  दौड़ना     पड़ा !

उनके होठों में दबी  आवाज़  हूँ  मैं  ,
कुछ  छोड़ना न था   छोड़ना   पड़ा !
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-कृष्णकान्त  भाटिया  'कान्त '
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