चीखें !!!
मासूम बच्चों की चीखें मुझे सोने नहीं देतीं ,
मेरी कमबख़्त आँखे भी मुझे रोने नहीं देतीं !
ये कैसा घिनौना रूप है विश्व के आतंक का ,
इक माँ बच्चे के खून के धब्बे धोने नहीं देती !
दुलारना देखा है हमारा इन छोटे से लाडलों ने,
बंदूक की गोलियाँ भी इन्हें शांत होने नहीं देतीं !
जहाँ किलकारियाँ थीं वहाँ कोहराम मचा है,
इंसानियत होती तो आतंक को बोने नहीं देती !
रहनुमा हमारे बॉडी गार्ड के साथ घूम रहे हैं ,
हुकूमत रैयत को युँ भरोशा खोने नहीं देती !
कब तक चलेगा अजगरी सिलसिला मौत का ,
कभी बेटे की गोली जननी को कोने नहीं देती !
कवि हुँ क़लम से लड़ाई लड़ शकता हुँ 'कान्त '
मेरी संवेदना कोई 'सर-कलम' करने नहीं देती !
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment