Tuesday, 16 December 2014

                          चीखें !!!

मासूम बच्चों की चीखें मुझे सोने नहीं देतीं ,
मेरी कमबख़्त आँखे भी मुझे रोने नहीं देतीं !

ये कैसा घिनौना रूप है विश्व के  आतंक का ,
इक माँ बच्चे के खून के धब्बे धोने नहीं देती ! 

दुलारना देखा है हमारा इन छोटे से लाडलों ने,
बंदूक की गोलियाँ भी इन्हें शांत होने नहीं देतीं !

जहाँ  किलकारियाँ  थीं  वहाँ  कोहराम मचा है,
इंसानियत होती तो आतंक को बोने नहीं देती !

रहनुमा  हमारे  बॉडी गार्ड  के  साथ  घूम रहे हैं ,
हुकूमत  रैयत को युँ  भरोशा  खोने नहीं   देती !

कब तक चलेगा अजगरी  सिलसिला  मौत का ,
कभी बेटे की  गोली  जननी को कोने नहीं देती !

कवि हुँ क़लम से  लड़ाई लड़ शकता  हुँ  'कान्त '
मेरी संवेदना  कोई 'सर-कलम' करने नहीं देती !
                              ***
-'कान्त'






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