Tuesday, 22 January 2019

ग़ज़ल 

डालते   हो   किस  लिए  रुख  पर  नक़ाब ,
छुप   भी   शकता  है   कहीं  ये  आफ़ताब  !

कंवल  जैसी  ये  आँखें ,लब  भी  गुले -तर,
निखरा   है    जन्नत  की  हूर  शा  शबाब !

तेरी दिलबरी, नाज़ ,अंदाज़  -क्या बात है ,
जरा  छेडूँ  तो  बज  उठता ,सुरीला  रबाब !

हँसी    तेरी ,  कायनात  को   करे  घायल, 
अदाएं  चंचल -शीतल-निर्मल -ला-ज़वाब  !

तेरा   यौवन,   वसंत ऋतू  की  भोर  वेला,
पिघल  जाए ,जिस्म  में  सुबह  का ख़्वाब !
                          *** 
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '


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