ग़ज़ल
डालते हो किस लिए रुख पर नक़ाब ,
छुप भी शकता है कहीं ये आफ़ताब !
कंवल जैसी ये आँखें ,लब भी गुले -तर,
निखरा है जन्नत की हूर शा शबाब !
तेरी दिलबरी, नाज़ ,अंदाज़ -क्या बात है ,
जरा छेडूँ तो बज उठता ,सुरीला रबाब !
हँसी तेरी , कायनात को करे घायल,
अदाएं चंचल -शीतल-निर्मल -ला-ज़वाब !
तेरा यौवन, वसंत ऋतू की भोर वेला,
पिघल जाए ,जिस्म में सुबह का ख़्वाब !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
डालते हो किस लिए रुख पर नक़ाब ,
छुप भी शकता है कहीं ये आफ़ताब !
कंवल जैसी ये आँखें ,लब भी गुले -तर,
निखरा है जन्नत की हूर शा शबाब !
तेरी दिलबरी, नाज़ ,अंदाज़ -क्या बात है ,
जरा छेडूँ तो बज उठता ,सुरीला रबाब !
हँसी तेरी , कायनात को करे घायल,
अदाएं चंचल -शीतल-निर्मल -ला-ज़वाब !
तेरा यौवन, वसंत ऋतू की भोर वेला,
पिघल जाए ,जिस्म में सुबह का ख़्वाब !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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