Wednesday, 4 September 2019

ग़ज़ल !

हमें   अँधेरा   ही  मिला   है,  उम्र  भर  के लिये ,
उजाला  रास   नहीं    आया  है  सफ़र  के लिये। 

यहाँ    शबनम    की   बूंदें     भी  रुला   देती  हैं ,
बहारें  बे-जुबाँ  लगती  हैं,   इस शहर  के लिये। 

हमें    मालूम   है , ये ग़ज़ल चल  नहीं  शकती ,
तड़पती कैसे देखें उसे, ,सच की डगर के लिये ?

सिरहाने    हमारे    जरा  तुम  अदब  से   बैठो ,
ज़िंदगी चल  पड़ी  हमारी,किसी नगर के लिये। 

इस  अंजुमन  से ,कहो  हम  कैसे  बाहर  आयें ?
सदीओं  तरशते  रहे हैं, तेरी इक नज़र के लिये। 

न हो  मौसम तो ,  हम   इज़हार को बदल देंगे,
बड़े  बेकरार  हैं हम , इश्क के   असर  के लिये। 

मरें    तो   तेरे   आगोश में  समाकर  हम  मरें,
जियें  तो  हमारी नगम  की इस बहर के लिये। 
                             ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '







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