ग़ज़ल !
हमें अँधेरा ही मिला है, उम्र भर के लिये ,
उजाला रास नहीं आया है सफ़र के लिये।
यहाँ शबनम की बूंदें भी रुला देती हैं ,
बहारें बे-जुबाँ लगती हैं, इस शहर के लिये।
हमें मालूम है , ये ग़ज़ल चल नहीं शकती ,
तड़पती कैसे देखें उसे, ,सच की डगर के लिये ?
सिरहाने हमारे जरा तुम अदब से बैठो ,
ज़िंदगी चल पड़ी हमारी,किसी नगर के लिये।
इस अंजुमन से ,कहो हम कैसे बाहर आयें ?
सदीओं तरशते रहे हैं, तेरी इक नज़र के लिये।
न हो मौसम तो , हम इज़हार को बदल देंगे,
बड़े बेकरार हैं हम , इश्क के असर के लिये।
मरें तो तेरे आगोश में समाकर हम मरें,
जियें तो हमारी नगम की इस बहर के लिये।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
हमें अँधेरा ही मिला है, उम्र भर के लिये ,
उजाला रास नहीं आया है सफ़र के लिये।
यहाँ शबनम की बूंदें भी रुला देती हैं ,
बहारें बे-जुबाँ लगती हैं, इस शहर के लिये।
हमें मालूम है , ये ग़ज़ल चल नहीं शकती ,
तड़पती कैसे देखें उसे, ,सच की डगर के लिये ?
सिरहाने हमारे जरा तुम अदब से बैठो ,
ज़िंदगी चल पड़ी हमारी,किसी नगर के लिये।
इस अंजुमन से ,कहो हम कैसे बाहर आयें ?
सदीओं तरशते रहे हैं, तेरी इक नज़र के लिये।
न हो मौसम तो , हम इज़हार को बदल देंगे,
बड़े बेकरार हैं हम , इश्क के असर के लिये।
मरें तो तेरे आगोश में समाकर हम मरें,
जियें तो हमारी नगम की इस बहर के लिये।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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