सावन !
रिमझिम बरसे सावन ,
घटा काली मनभावन।
सारे बाँध टूटे ,मौसम के,
बरखा की आवन -जावन.
उमड़-घुमड़ बादल बरसे,
गीत गाती घूमे बंजारन।
हरियाली छाई धरती पे,
पानी की हर बूँद पावन।
ठकुरसहाती करनी नहीं ,
कायनात लगे है सुहावन।
बियाबान झूमे नए रूप में,
आये अँगना पतित पावन।
पपीहा गुनगुनाये नये गीत,
मोर की कलाऐं पूरी बावन।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
रिमझिम बरसे सावन ,
घटा काली मनभावन।
सारे बाँध टूटे ,मौसम के,
बरखा की आवन -जावन.
उमड़-घुमड़ बादल बरसे,
गीत गाती घूमे बंजारन।
हरियाली छाई धरती पे,
पानी की हर बूँद पावन।
ठकुरसहाती करनी नहीं ,
कायनात लगे है सुहावन।
बियाबान झूमे नए रूप में,
आये अँगना पतित पावन।
पपीहा गुनगुनाये नये गीत,
मोर की कलाऐं पूरी बावन।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '