बचपन !
मेरा बचपन लौट आया,बारिश की रिमझिम बूंदो में,
कागजकी नाव लहराई ,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
मेघधनुष्यकी छाया ,मेरे मनमें रगों को भरती थी,
बादल की परछाई दौड़कर ,संग संग में चलती थी ,
पपीहा बोलता पाया, बारिश की रिमझिम बूंदों में।
कागज की नाव लहराई ,बारिश की रिमझिम बूंदो में।
महाप्रपात पालरधुने का, चकाचौंध कर जाता था,
डुबकी मारो, मुझको ललकारो ,कहकर वो बुलाता था.
वो सारी खुशियाँ पाईं ,बारिश की रिमझिम बूंदों में,
कागज़ की नाव लहराई,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
तालाब लहराते थे , खेतों में नई जान आ जाती,
प्रकृति नीली चुनर ओढ़कर,दुल्हन शी शरमा जाती।
नन्हीं आंखें मुस्कराईं ,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
कागज की नाव लहराई,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
मेरा बचपन लौट आया,बारिश की रिमझिम बूंदो में,
कागजकी नाव लहराई ,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
मेघधनुष्यकी छाया ,मेरे मनमें रगों को भरती थी,
बादल की परछाई दौड़कर ,संग संग में चलती थी ,
पपीहा बोलता पाया, बारिश की रिमझिम बूंदों में।
कागज की नाव लहराई ,बारिश की रिमझिम बूंदो में।
महाप्रपात पालरधुने का, चकाचौंध कर जाता था,
डुबकी मारो, मुझको ललकारो ,कहकर वो बुलाता था.
वो सारी खुशियाँ पाईं ,बारिश की रिमझिम बूंदों में,
कागज़ की नाव लहराई,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
तालाब लहराते थे , खेतों में नई जान आ जाती,
प्रकृति नीली चुनर ओढ़कर,दुल्हन शी शरमा जाती।
नन्हीं आंखें मुस्कराईं ,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
कागज की नाव लहराई,बारिश की रिमझिम बूंदों में।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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