--------------कवियत्री -------------------------
एक कवियत्री जैसे ही माइक पर आई ,
माइक ने सीटी बजाई।
कवियत्री झुंझलाके बोली। 'क्यों भैया
सीटी बजाते हो,हमें क्यों उकसाते हो?
कविता पाठ तो हमें करना है ,
तुम नहीं रह शकते मौन ?'
सीटी बजाके माइक बोला ,'हम आपके हैं कौन ?'
कवियत्री चिल्लाई उसने बड़ी बड़ी आँखे दिखाईं
कहने लगी कवि कविता पाठ करने आते हैं
तब तुम चुपचाप सुनते हो और मुझे देख
क्यों बिगड़ते हो ?
क्यों ऐसा व्यहार ?माइक फिर सीटी बजाके बोला
''प्यार ही प्यार .......'
कवियत्री गिन्नाई खरी खोटी सुनाई आग बबूला
हो गई। बोली 'जानते हो इस व्यहार को क्या कहते हैं ?'
माइक बोला मेडम 'हम आपके दिल में रहते हैं '
कवियत्री ने अपना सारा गुस्सा माइक पे उतारा
उसे स्टेज से नीचे दे मारा
गिरते गिरते सीटी मारकर बोला 'झुक गया आसमान '
तब कवियत्री चली बिजली की स्विच करने ऑफ
माइक बोला 'कवियत्रिजी मुझे सीटी बजाने का नहीं है शोख
मैं नहीं करता किसीसे नोंक झोंक बात युँ है
मैं हुँ नर आप हैं नारी जैसे ही आप मुझे छूती हैं
मैं बन जाता हुँ बनवारी…
मैं राजा पाठ में आ जाता हुँ करूँ तो क्या करूँ
सिर्फ सीटी बजाता हुँ ……'
------------------------------------------------------------
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक '
-------------------------------------------------------------
-----------------------------સ્પર્શ -----------------------------------
ReplyDelete...ત્રણ દાયકાના વહાણાં વાઈ ચૂક્યાં છે જેમનાં મૃત્યુને,પણ
એવો એક પણ દિવસ નથી વીત્યો કે એમનાથી મુલાકાત ન
થઈ હોય.કયારેક ટી.વી.-કયારેક કોઈ હોટલ કે ગલીના ખૂણા
ની પાનની કેબીન-કયારેક લગ્નનું રીસેપ્શન-ક્યારેક કોઈકના
ગણગણતા હોઠ.....એકજ વાત કહે છે,'વીત્યો તો સમય છે,રફી
નહીં, એ તો આજે પણ જીવે છે એમના ચાહકોના દિલમાં.'
...કદાચ એટલે જ નૌશાદ સાહેબ કહે છે ,'गूंजते हैं तेरे नगमों से
अमीरों के महल,झोंपड़ों में भी ग़रीबों के तेरी आवाज़ है। अपनी
मूसीक़ी पर सबको फ़क्र होता है,मगर मेरे साथी आज मूसीक़ी को
तुम पर नाज़ है। 'હા,મિત્રો હિન્દી સિનેમાના સદાબહાર ગાયક
સૂર સમ્રાટ મોહમ્મદ રફીનો આજે જન્મ દિવસ છે.આ ફનકારની
ગાયક તરીકેની યાત્રા 28 ફેબ્રુઆરી,1941 ના રોજ લાહોર થી
શરુ થઇ હતી.સંગીતકાર શ્યામ સુંદરે પંજાબી ફિલ્મ 'ગુલ બલોચ'
માં રફી પાસેથી એક ગીત ગવડાવ્યું 'સોણીએ ની હીરિયે ની તેરી
યાદ ને બહુત તડપાયા...'માત્ર સત્તર વર્ષની વયમાં રફીનું ગાયેલું
આ ગીત ખૂબ લોકપ્રિય થયું.
...ત્યાર બાદ મુંબઈમાં રફીએ પહેલી વાર હિન્દી ફિલ્મ 'गाँव की
गोरी 'માટે ગીતો ગાયાં જે ખૂબજ લોકપ્રિય થયાં.અને પછી તો આ
કારવાં ચાલતો રહ્યો ....ચાલતો રહ્યો.....રફીની ગાયકી ખીલતી રહી.
એમણે એ જમાનાના દિગજ્જ અભિનેતાઓને પોતાનો સૂર આપ્યો.
તેઓ નૌશાદના મનપસંદ ગાયક હતા.ફિલ્મ 'અંદાઝ ', 'મેલા ','આન',
'બૈજુબાવરા','દુલારી','મુગલે આજમ',મધર ઇન્ડિયા','મેરે મહેબૂબ',
અને 'કોહિનૂર' જેવી સફળ ફિલ્મોમાં આ જોડીએ ગીત-સંગીતને અમર
બનાવ્યું.
...રફીની ગાયકીના અલગ-અલગ અંદાઝ હતા.આનું ઉદાહરણ ફિલ્મ
'અંદાઝ ' ના આ બે ગીતો છે.'जब दिल से दिल टकराता है...'અને 'मेरे
पैरों में घुंघरु बंधा दे …'પહેલું ગીત થીયેટરમાં એકદમ મૌનની લગામ
સમય પર બાંધી દેતું જયારે બીજું ગીત દર્શકોની નસ નસ માં રક્ત
સંચાર વધારી દેતું.રફીએ ઘણાં ગીતો ગાયાં પણ જાદુઈ અસરવાળું
'बहारो फूल बरसाओ,मेरा महबूब आया है....'આજે પણ ભૂલી શકાતું
નથી.
...રફી સાહેબે જે કંઈ ગાયું ,દિલથી ગાયું.'अई-अई या करूं मैं क्या
सुकू-सुकू...'જેવું રોમાન્ટિક ગીત હોય કે 'सौ बार जनम लेंगे.....'જેવું
કરુણ ગીત હોય ,અથવા 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज....'જેવું
શાસ્ત્રીય રાગ આધારિત ગીત હોય.રફીએ હિન્દી સિનેમાના જૂની
અને નવી પેઢીના અદાકારો માટે ગીતો ગાયાં છે.રફીની આવાઝ
ભારતીય જનમાનસની આવાઝ હતી.એમણે ચાલીસ વર્ષની પો -
તાની કારકિર્દી દરમિયાન લગભગ 26 હજાર જેટલાં ગીતો ગાયાં,
આજે હું એટલુંજ કહું ,' हम तुम्हें युं भुला न पाएँगे,होठों पर तेरे ही
गीत आयेंगे। रफी तुम इतने लाजवाब थे ,ज़िंदगी भर तुझे ही गुनगुनायेंगे।
-----------------------------------------------------------------------------------
-(કૃષ્ણકાંત ભાટિયા 'કાન્ત',લખ્યા તા .24-12-2013,સોમવાર ,12:46 PM)
---------------------------------------------------------------------------------------
------------------------બાપુ---------------------------
ReplyDelete..દાદા-દાદી પાર્ક પાસે ઊભેલા ગાંધી સાથે આજે
મુલાકાત કરી ,મનની વાત કરી,રજૂઆત કરી.
એ આજે બહુ ખુશ હતા,સ્વસ્થ હતા,સંતુષ્ટ હતા.
એમના હોઠો પર લાંબા સમય પછી હાસ્ય જોઈ ,
મેં એમને પૂછયું ,'બાપુ ,આજે તમારો ચહેરો ઉદાસ
નથી....ભીતર પણ અમાસ નથી.શું વાત છે?કશું
ખાસ છે ?આ શેનો અજવાસ છે?'
...બાપુ હસીને બોલ્યા,'કવિ 'કાન્ત' તમે હજી છો
અભ્રાંત !જોયું નહીં મારા સ્વપ્નનું અરવિંદ (કમળ)
રાજનીતિના કાદવમાં ખીલ્યું છે,એનું વજન જનતાએ
ઝીલ્યું છે.આમ આદમીની સાથે,બંગલા વગર,કોઈ
લાલ લાઈટવાળી ગાડી વગર,કોઈ સુરક્ષા વગર
આ કેજરીવાલે રહેવાનો સંકલ્પ કર્યો છે,તેથી એ
મારા હૈયામાં વસ્યો છે.'
...આઝાદી પહેલાં મેં સેવેલા નેતાઓની છબી આજે
એણે પ્રદર્શિત કરી.ઇન્ડિયા નહિ અરવિંદ 'ભારતનો'
કદાચ આ સાંપ્રત સમયનો પહેલો મુખ્ય મંત્રી હશે
કે જે જનતાની વચ્ચે રહેશે.મારું સ્વપ્ન આજે પૂરું
થાય છે.મારી આંખમાંથી હર્ષની વણઝાર જાય છે.
-------------------------------------------------------------
-કૃષ્ણકાંત ભાટિયા 'કાન્ત'
(લખ્યા તા.24-12-2013,મંગળવાર,05:03 PM)
--------------------------------------------------------------
------------------------બાપુ---------------------------
ReplyDelete..દાદા-દાદી પાર્ક પાસે ઊભેલા ગાંધી સાથે આજે
મુલાકાત કરી ,મનની વાત કરી,રજૂઆત કરી.
એ આજે બહુ ખુશ હતા,સ્વસ્થ હતા,સંતુષ્ટ હતા.
એમના હોઠો પર લાંબા સમય પછી હાસ્ય જોઈ ,
મેં એમને પૂછયું ,'બાપુ ,આજે તમારો ચહેરો ઉદાસ
નથી....ભીતર પણ અમાસ નથી.શું વાત છે?કશું
ખાસ છે ?આ શેનો અજવાસ છે?'
...બાપુ હસીને બોલ્યા,'કવિ 'કાન્ત' તમે હજી છો
અભ્રાંત !જોયું નહીં મારા સ્વપ્નનું અરવિંદ (કમળ)
રાજનીતિના કાદવમાં ખીલ્યું છે,એનું વજન જનતાએ
ઝીલ્યું છે.આમ આદમીની સાથે,બંગલા વગર,કોઈ
લાલ લાઈટવાળી ગાડી વગર,કોઈ સુરક્ષા વગર
આ કેજરીવાલે રહેવાનો સંકલ્પ કર્યો છે,તેથી એ
મારા હૈયામાં વસ્યો છે.'
...આઝાદી પહેલાં મેં સેવેલા નેતાઓની છબી આજે
એણે પ્રદર્શિત કરી.ઇન્ડિયા નહિ અરવિંદ 'ભારતનો'
કદાચ આ સાંપ્રત સમયનો પહેલો મુખ્ય મંત્રી હશે
કે જે જનતાની વચ્ચે રહેશે.મારું સ્વપ્ન આજે પૂરું
થાય છે.મારી આંખમાંથી હર્ષની વણઝાર જાય છે.
-------------------------------------------------------------
-કૃષ્ણકાંત ભાટિયા 'કાન્ત'
(લખ્યા તા.24-12-2013,મંગળવાર,05:03 PM)
--------------------------------------------------------------
--------------------------------स्पर्श ----------------------------
ReplyDelete.... मैंने जगजीतसिंह की ग़ज़ल सुनने के लिए जैसे ही मेरा डी.वी.डी
प्लेयर ऑन किया तो मेरे कानोंमें एक जानी-पहचानी आवाज़ गूंजने
लगी,मैं हेरान रह गया 'अरे! ये आवाज़ तो वाजपेयीजी की है !'वो कह
रहे थे ,'इमरजंसी के दौरान मेरी सेहत की वज़ह से मुझे दिल्ही के एक
अस्पताल में रख्खा गया था। यहां पूरा दिन सन्नाटा छाया रहता था।
देर रात को दूरसे किसीके रोने की आवाज़ आती थी। ये आवाज़ मुझे
सोने नहीं देती थी ,विचलित करती थी। मैंने जानना चाहा ये दूर -दूर
कौन रोता है ?मुझे बताया गया कि अस्पताल में जब किसीके स्व्जन
की मृत्यु हो जाती है तब उसके परिवार वाले रोते हैं। ये उनकी आवाज़
है। उस रात मैं सोया नहीं ,मेरी आँखों से अविरत आँसू बहते रहे और
मेरी लेखनी से यह ग़ज़ल निकल पड़ी!'
.... और जगजीतसिंह अपने मखमली अंदाज़ में ये ग़ज़ल पेश कर रहे
थे ....... 'दूर कहीं कोई रोता है ,तन पर पहरा ,भटक रहा मन
………. साथी है केवल सूनापन,बिछड़ गया क्या स्वजन किसीका,
.......... .. कृन्द्न सदा करुण होता है,दूर कहीं कोई रोता है।
………. जनम दिवस पर हम इठलाएँ,क्युँ न मरण त्योहार
.......... .. मनायें,अंतिम यात्रा के अवसर पर आँसू का शकुन होता है।
………. दूर कहीं कोई रोता है।
……….अंतर रोये आँख न रोये,धुल जायेंगे स्वप्न सँजोये ,
………. छलना भरे विश्व में केवल,सपना भी तो सच होता है।
..........…इस जीवन से मृत्यु भली है,आतमचित जब गली-गली है।
………..मैं भी रोता आसपास जब कोई कहीं नहीं होता है।
.......... .. दूर कहीं कोई रोता है।
... ये गज़ल सुनकर मेरी आँखे नम हो गई,सोचा राजनीति के गलियारों
ने एक संवेदन शील कवि को कैद कर के रख लिया। हमारे पूर्व प्रधान
मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिनका आज जन्म दिवस है। वाजपेयी जी
को मैंने कवि के रूप में ही चाहा है। इतनी अनुकंपा वाली शख्शियत का
राजनीति में क्या काम !ये राजनीति ही कवि अटल को खा गई। तभी
तो उन्होंने लिखा 'घुट-घुट कर मर जाना होगा,टूट गया दिल मिली न मंज़िल
फिर भी कदम बढ़ाना होगा……'
… शायद उन्हें अपनी मंज़िल कभी नहीं मिली। वो तलाशते रहे सभी को
आजमाते रहे तब उनकी लेखिनी से शब्द प्रकटे 'कौन कौरव कौन पांडव टेड़ा
सवाल है,दोनों ओर शकुनि का फैला कूट ज़ाल है। हर पंचायत में पांचाली
पीड़ित है ,द्रौपदीको सब कुछ खोना है ,राजा कोई भी बने रंक को तो रोना है। '
अटलजी आज भी हमारी राजधनी की सड़कों पर औरतको सब कुछ खोना
पड़ता है....आज भी वो दाव पर लगाई जाती है ,कोठे पर बिठाई जाती है।
… ये विडंबना है कि सहदेव की माफिक सब कुछ जानते हुए भी वो भीष्म
की तरह मौन रहे। सारा दर्द अपने भीतर समेटा,अपने आँसू खुद ढोये। अपनी
पीड़ा किसीको बता नहीं शके ,जता नहीं शके ,मिटा नहीं शके। आज उन्होंने
89 साल पूरे किये 90 में प्रवेश किया इस मौके पर मै इतना ही कहना चाहूँगा
कि,'अटलजी आओ फिर से दिया जलायें ,अपने आँसू पौंछकर फिर से मुस्करायें ..'
--------------------------------------------------------------------------------
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक' (दिनांक :25 -12- 2013,बुधवार ,6 :50 A M )
--------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------स्पर्श ----------------------------
ReplyDelete.... मैंने जगजीतसिंह की ग़ज़ल सुनने के लिए जैसे ही मेरा डी.वी.डी
प्लेयर ऑन किया तो मेरे कानोंमें एक जानी-पहचानी आवाज़ गूंजने
लगी,मैं हेरान रह गया 'अरे! ये आवाज़ तो वाजपेयीजी की है !'वो कह
रहे थे ,'इमरजंसी के दौरान मेरी सेहत की वज़ह से मुझे दिल्ही के एक
अस्पताल में रख्खा गया था। यहां पूरा दिन सन्नाटा छाया रहता था।
देर रात को दूरसे किसीके रोने की आवाज़ आती थी। ये आवाज़ मुझे
सोने नहीं देती थी ,विचलित करती थी। मैंने जानना चाहा ये दूर -दूर
कौन रोता है ?मुझे बताया गया कि अस्पताल में जब किसीके स्व्जन
की मृत्यु हो जाती है तब उसके परिवार वाले रोते हैं। ये उनकी आवाज़
है। उस रात मैं सोया नहीं ,मेरी आँखों से अविरत आँसू बहते रहे और
मेरी लेखनी से यह ग़ज़ल निकल पड़ी!'
.... और जगजीतसिंह अपने मखमली अंदाज़ में ये ग़ज़ल पेश कर रहे
थे ....... 'दूर कहीं कोई रोता है ,तन पर पहरा ,भटक रहा मन
………. साथी है केवल सूनापन,बिछड़ गया क्या स्वजन किसीका,
.......... .. कृन्द्न सदा करुण होता है,दूर कहीं कोई रोता है।
………. जनम दिवस पर हम इठलाएँ,क्युँ न मरण त्योहार
.......... .. मनायें,अंतिम यात्रा के अवसर पर आँसू का शकुन होता है।
………. दूर कहीं कोई रोता है।
……….अंतर रोये आँख न रोये,धुल जायेंगे स्वप्न सँजोये ,
………. छलना भरे विश्व में केवल,सपना भी तो सच होता है।
..........…इस जीवन से मृत्यु भली है,आतमचित जब गली-गली है।
………..मैं भी रोता आसपास जब कोई कहीं नहीं होता है।
.......... .. दूर कहीं कोई रोता है।
... ये गज़ल सुनकर मेरी आँखे नम हो गई,सोचा राजनीति के गलियारों
ने एक संवेदन शील कवि को कैद कर के रख लिया। हमारे पूर्व प्रधान
मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिनका आज जन्म दिवस है। वाजपेयी जी
को मैंने कवि के रूप में ही चाहा है। इतनी अनुकंपा वाली शख्शियत का
राजनीति में क्या काम !ये राजनीति ही कवि अटल को खा गई। तभी
तो उन्होंने लिखा 'घुट-घुट कर मर जाना होगा,टूट गया दिल मिली न मंज़िल
फिर भी कदम बढ़ाना होगा……'
… शायद उन्हें अपनी मंज़िल कभी नहीं मिली। वो तलाशते रहे सभी को
आजमाते रहे तब उनकी लेखिनी से शब्द प्रकटे 'कौन कौरव कौन पांडव टेड़ा
सवाल है,दोनों ओर शकुनि का फैला कूट ज़ाल है। हर पंचायत में पांचाली
पीड़ित है ,द्रौपदीको सब कुछ खोना है ,राजा कोई भी बने रंक को तो रोना है। '
अटलजी आज भी हमारी राजधनी की सड़कों पर औरतको सब कुछ खोना
पड़ता है....आज भी वो दाव पर लगाई जाती है ,कोठे पर बिठाई जाती है।
… ये विडंबना है कि सहदेव की माफिक सब कुछ जानते हुए भी वो भीष्म
की तरह मौन रहे। सारा दर्द अपने भीतर समेटा,अपने आँसू खुद ढोये। अपनी
पीड़ा किसीको बता नहीं शके ,जता नहीं शके ,मिटा नहीं शके। आज उन्होंने
89 साल पूरे किये 90 में प्रवेश किया इस मौके पर मै इतना ही कहना चाहूँगा
कि,'अटलजी आओ फिर से दिया जलायें ,अपने आँसू पौंछकर फिर से मुस्करायें ..'
--------------------------------------------------------------------------------
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक' (दिनांक :25 -12- 2013,बुधवार ,6 :50 A M )
--------------------------------------------------------------------------------