--------------------------------स्पर्श ----------------------------
.... मैंने जगजीतसिंह की ग़ज़ल सुनने के लिए जैसे ही मेरा डी.वी.डी
प्लेयर ऑन किया तो मेरे कानोंमें एक जानी-पहचानी आवाज़ गूंजने
लगी,मैं हेरान रह गया 'अरे! ये आवाज़ तो वाजपेयीजी की है !'वो कह
रहे थे ,'इमरजंसी के दौरान मेरी सेहत की वज़ह से मुझे दिल्ही के एक
अस्पताल में रख्खा गया था। यहां पूरा दिन सन्नाटा छाया रहता था।
देर रात को दूरसे किसीके रोने की आवाज़ आती थी। ये आवाज़ मुझे
सोने नहीं देती थी ,विचलित करती थी। मैंने जानना चाहा ये दूर -दूर
कौन रोता है ?मुझे बताया गया कि अस्पताल में जब किसीके स्व्जन
की मृत्यु हो जाती है तब उसके परिवार वाले रोते हैं। ये उनकी आवाज़
है। उस रात मैं सोया नहीं ,मेरी आँखों से अविरत आँसू बहते रहे और
मेरी लेखनी से यह ग़ज़ल निकल पड़ी!'
.... और जगजीतसिंह अपने मखमली अंदाज़ में ये ग़ज़ल पेश कर रहे
थे ....... 'दूर कहीं कोई रोता है ,तन पर पहरा ,भटक रहा मन
………. साथी है केवल सूनापन,बिछड़ गया क्या स्वजन किसीका,
.......... .. कृन्द्न सदा करुण होता है,दूर कहीं कोई रोता है।
………. जनम दिवस पर हम इठलाएँ,क्युँ न मरण त्योहार
.......... .. मनायें,अंतिम यात्रा के अवसर पर आँसू का शकुन होता है।
………. दूर कहीं कोई रोता है।
……….अंतर रोये आँख न रोये,धुल जायेंगे स्वप्न सँजोये ,
………. छलना भरे विश्व में केवल,सपना भी तो सच होता है।
..........…इस जीवन से मृत्यु भली है,आतमचित जब गली-गली है।
………..मैं भी रोता आसपास जब कोई कहीं नहीं होता है।
.......... .. दूर कहीं कोई रोता है।
... ये गज़ल सुनकर मेरी आँखे नम हो गई,सोचा राजनीति के गलियारों
ने एक संवेदन शील कवि को कैद कर के रख लिया। हमारे पूर्व प्रधान
मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिनका आज जन्म दिवस है। वाजपेयी जी
को मैंने कवि के रूप में ही चाहा है। इतनी अनुकंपा वाली शख्शियत का
राजनीति में क्या काम !ये राजनीति ही कवि अटल को खा गई। तभी
तो उन्होंने लिखा 'घुट-घुट कर मर जाना होगा,टूट गया दिल मिली न मंज़िल
फिर भी कदम बढ़ाना होगा……'
… शायद उन्हें अपनी मंज़िल कभी नहीं मिली। वो तलाशते रहे सभी को
आजमाते रहे तब उनकी लेखिनी से शब्द प्रकटे 'कौन कौरव कौन पांडव टेड़ा
सवाल है,दोनों ओर शकुनि का फैला कूट ज़ाल है। हर पंचायत में पांचाली
पीड़ित है ,द्रौपदीको सब कुछ खोना है ,राजा कोई भी बने रंक को तो रोना है। '
अटलजी आज भी हमारी राजधनी की सड़कों पर औरतको सब कुछ खोना
पड़ता है....आज भी वो दाव पर लगाई जाती है ,कोठे पर बिठाई जाती है।
… ये विडंबना है कि सहदेव की माफिक सब कुछ जानते हुए भी वो भीष्म
की तरह मौन रहे। सारा दर्द अपने भीतर समेटा,अपने आँसू खुद ढोये। अपनी
पीड़ा किसीको बता नहीं शके ,जता नहीं शके ,मिटा नहीं शके। आज उन्होंने
89 साल पूरे किये 90 में प्रवेश किया इस मौके पर मै इतना ही कहना चाहूँगा
कि,'अटलजी आओ फिर से दिया जलायें ,अपने आँसू पौंछकर फिर से मुस्करायें ..'
--------------------------------------------------------------------------------
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक' (दिनांक :25 -12- 2013,बुधवार ,6 :50 A M )
--------------------------------------------------------------------------------
.... मैंने जगजीतसिंह की ग़ज़ल सुनने के लिए जैसे ही मेरा डी.वी.डी
प्लेयर ऑन किया तो मेरे कानोंमें एक जानी-पहचानी आवाज़ गूंजने
लगी,मैं हेरान रह गया 'अरे! ये आवाज़ तो वाजपेयीजी की है !'वो कह
रहे थे ,'इमरजंसी के दौरान मेरी सेहत की वज़ह से मुझे दिल्ही के एक
अस्पताल में रख्खा गया था। यहां पूरा दिन सन्नाटा छाया रहता था।
देर रात को दूरसे किसीके रोने की आवाज़ आती थी। ये आवाज़ मुझे
सोने नहीं देती थी ,विचलित करती थी। मैंने जानना चाहा ये दूर -दूर
कौन रोता है ?मुझे बताया गया कि अस्पताल में जब किसीके स्व्जन
की मृत्यु हो जाती है तब उसके परिवार वाले रोते हैं। ये उनकी आवाज़
है। उस रात मैं सोया नहीं ,मेरी आँखों से अविरत आँसू बहते रहे और
मेरी लेखनी से यह ग़ज़ल निकल पड़ी!'
.... और जगजीतसिंह अपने मखमली अंदाज़ में ये ग़ज़ल पेश कर रहे
थे ....... 'दूर कहीं कोई रोता है ,तन पर पहरा ,भटक रहा मन
………. साथी है केवल सूनापन,बिछड़ गया क्या स्वजन किसीका,
.......... .. कृन्द्न सदा करुण होता है,दूर कहीं कोई रोता है।
………. जनम दिवस पर हम इठलाएँ,क्युँ न मरण त्योहार
.......... .. मनायें,अंतिम यात्रा के अवसर पर आँसू का शकुन होता है।
………. दूर कहीं कोई रोता है।
……….अंतर रोये आँख न रोये,धुल जायेंगे स्वप्न सँजोये ,
………. छलना भरे विश्व में केवल,सपना भी तो सच होता है।
..........…इस जीवन से मृत्यु भली है,आतमचित जब गली-गली है।
………..मैं भी रोता आसपास जब कोई कहीं नहीं होता है।
.......... .. दूर कहीं कोई रोता है।
... ये गज़ल सुनकर मेरी आँखे नम हो गई,सोचा राजनीति के गलियारों
ने एक संवेदन शील कवि को कैद कर के रख लिया। हमारे पूर्व प्रधान
मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिनका आज जन्म दिवस है। वाजपेयी जी
को मैंने कवि के रूप में ही चाहा है। इतनी अनुकंपा वाली शख्शियत का
राजनीति में क्या काम !ये राजनीति ही कवि अटल को खा गई। तभी
तो उन्होंने लिखा 'घुट-घुट कर मर जाना होगा,टूट गया दिल मिली न मंज़िल
फिर भी कदम बढ़ाना होगा……'
… शायद उन्हें अपनी मंज़िल कभी नहीं मिली। वो तलाशते रहे सभी को
आजमाते रहे तब उनकी लेखिनी से शब्द प्रकटे 'कौन कौरव कौन पांडव टेड़ा
सवाल है,दोनों ओर शकुनि का फैला कूट ज़ाल है। हर पंचायत में पांचाली
पीड़ित है ,द्रौपदीको सब कुछ खोना है ,राजा कोई भी बने रंक को तो रोना है। '
अटलजी आज भी हमारी राजधनी की सड़कों पर औरतको सब कुछ खोना
पड़ता है....आज भी वो दाव पर लगाई जाती है ,कोठे पर बिठाई जाती है।
… ये विडंबना है कि सहदेव की माफिक सब कुछ जानते हुए भी वो भीष्म
की तरह मौन रहे। सारा दर्द अपने भीतर समेटा,अपने आँसू खुद ढोये। अपनी
पीड़ा किसीको बता नहीं शके ,जता नहीं शके ,मिटा नहीं शके। आज उन्होंने
89 साल पूरे किये 90 में प्रवेश किया इस मौके पर मै इतना ही कहना चाहूँगा
कि,'अटलजी आओ फिर से दिया जलायें ,अपने आँसू पौंछकर फिर से मुस्करायें ..'
--------------------------------------------------------------------------------
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक' (दिनांक :25 -12- 2013,बुधवार ,6 :50 A M )
--------------------------------------------------------------------------------
No comments:
Post a Comment