मैं ज़िंदा हूँ।
(अछां दस )
आज सवेरे मैंने अपने
घर की सारी खिड़कियाँ खोल दीं।
नीलगगन और फूलों की खुशबू को
आने दिया कमरे में।
मेरे समग्र अस्तित्व को
सूरज की किरणों से नहलाया।
वृक्ष पर्णों की मर्मर ध्वनि को
पकड़ा अपने कानों से
खुद को कुलबुलाया पंछीओं की मधुर गान से।
तुषार बिंदुओं का अभिषेक किया पलकों पर
निसर्ग के निमंत्रण को किया स्वीकार।
मेरे भीतर से उठी एक पुकार
मैं ज़िंदा हूँ .....मैं ज़िंदा हूँ।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
(अछां दस )
आज सवेरे मैंने अपने
घर की सारी खिड़कियाँ खोल दीं।
नीलगगन और फूलों की खुशबू को
आने दिया कमरे में।
मेरे समग्र अस्तित्व को
सूरज की किरणों से नहलाया।
वृक्ष पर्णों की मर्मर ध्वनि को
पकड़ा अपने कानों से
खुद को कुलबुलाया पंछीओं की मधुर गान से।
तुषार बिंदुओं का अभिषेक किया पलकों पर
निसर्ग के निमंत्रण को किया स्वीकार।
मेरे भीतर से उठी एक पुकार
मैं ज़िंदा हूँ .....मैं ज़िंदा हूँ।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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