यहाँ !
यहाँ गंगा भी बहती है ,यहाँ जमना भी बहती है,
कथा जेलम भी कहती है, कथा सतलज भी कहती है।
हमारा मुल्क है रोशन हिमालय की श्वेत बुलंदी से,
मानस की कहानी ये ,सुनी थी इक दिन मैंने नंदी से।
यहाँ शबनम भी रहती है, यहाँ गुलशन भी रहती है,
वतन पे ये भी मरती है, वतन पे वो भी मरती है।
हवाओं का मचलना और पुरवाई से दौड़कर चलना,
समंदर की क्षितिज पर सूर्य का पश्चिम में यूँ ढ़लना।
बहारें भी चमकती हैं , यहाँ निगाहें भी चमकती हैं,
मौसम में ये थिरकती हैं , मौसम में वो थिरकती हैं।
मुस्कराता है सावन जब , बरसता है ये खेतों पर,
यहाँ की मिट्टी का तिलक चमके , घटाएँ बोलें हर।
घटाएँ भी मचलती हैं ,यहाँ अदाएँ भी मचलती हैं ,
आहें ये भी भरती हैं , आहें वो भी भरती हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
यहाँ गंगा भी बहती है ,यहाँ जमना भी बहती है,
कथा जेलम भी कहती है, कथा सतलज भी कहती है।
हमारा मुल्क है रोशन हिमालय की श्वेत बुलंदी से,
मानस की कहानी ये ,सुनी थी इक दिन मैंने नंदी से।
यहाँ शबनम भी रहती है, यहाँ गुलशन भी रहती है,
वतन पे ये भी मरती है, वतन पे वो भी मरती है।
हवाओं का मचलना और पुरवाई से दौड़कर चलना,
समंदर की क्षितिज पर सूर्य का पश्चिम में यूँ ढ़लना।
बहारें भी चमकती हैं , यहाँ निगाहें भी चमकती हैं,
मौसम में ये थिरकती हैं , मौसम में वो थिरकती हैं।
मुस्कराता है सावन जब , बरसता है ये खेतों पर,
यहाँ की मिट्टी का तिलक चमके , घटाएँ बोलें हर।
घटाएँ भी मचलती हैं ,यहाँ अदाएँ भी मचलती हैं ,
आहें ये भी भरती हैं , आहें वो भी भरती हैं।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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