Monday, 13 January 2020

वंचित  !

काफ़िला    दिलों      का   लेकर   चले   थे   तुम    वंचित !
अपने   आप   में   भीतर   ही   भीतर  जले  थे तुम वंचित !

क़ाबिले    तारीफ़    थे     तुम्हारे   अलफ़ाज़ ,  ओ  शायर,
गीत-ग़ज़ल    के    बागबान   बनकर फले  थे तुम वंचित !

सन्नाटे    को    भी    गले   से  लगाया-सुलझाया  तुमने,
अपनी   रवानगी  - इज़हार   से  खिले    थे    तुम वंचित !

दिलेपूर    आरज़ू    से   छलकतीं  थीं  तुम्हारी  कविताएँ ,
हमें  गले लगाकर-पीठ थपथपाकर  मिले थे तुम वंचित !

कायनात भी  आज   फूट  फूट  कर  रो   रही  है  ज़ालिम ,
शायरी के  हर फन-छंद -मीटर  से  सजे  थे  तुम  वंचित !

गर्दिश  का  ये सिलसिला  आज  तुम्हें   ले  गया यहां  से,
जामे  ऐश  पीकर  हर  अंजुमन   में  पले  थे  तुम  वंचित !

फलक -जमीं -गुलशन  उदास  है,दोस्त तेरे चले जाने  से,
सिरहाज पे  शिर था तुम्हारा,आँख मूंदे ढले थे तुम वंचित !
                                       ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

No comments:

Post a Comment