वंचित !
काफ़िला दिलों का लेकर चले थे तुम वंचित !
अपने आप में भीतर ही भीतर जले थे तुम वंचित !
क़ाबिले तारीफ़ थे तुम्हारे अलफ़ाज़ , ओ शायर,
गीत-ग़ज़ल के बागबान बनकर फले थे तुम वंचित !
सन्नाटे को भी गले से लगाया-सुलझाया तुमने,
अपनी रवानगी - इज़हार से खिले थे तुम वंचित !
दिलेपूर आरज़ू से छलकतीं थीं तुम्हारी कविताएँ ,
हमें गले लगाकर-पीठ थपथपाकर मिले थे तुम वंचित !
कायनात भी आज फूट फूट कर रो रही है ज़ालिम ,
शायरी के हर फन-छंद -मीटर से सजे थे तुम वंचित !
गर्दिश का ये सिलसिला आज तुम्हें ले गया यहां से,
जामे ऐश पीकर हर अंजुमन में पले थे तुम वंचित !
फलक -जमीं -गुलशन उदास है,दोस्त तेरे चले जाने से,
सिरहाज पे शिर था तुम्हारा,आँख मूंदे ढले थे तुम वंचित !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
काफ़िला दिलों का लेकर चले थे तुम वंचित !
अपने आप में भीतर ही भीतर जले थे तुम वंचित !
क़ाबिले तारीफ़ थे तुम्हारे अलफ़ाज़ , ओ शायर,
गीत-ग़ज़ल के बागबान बनकर फले थे तुम वंचित !
सन्नाटे को भी गले से लगाया-सुलझाया तुमने,
अपनी रवानगी - इज़हार से खिले थे तुम वंचित !
दिलेपूर आरज़ू से छलकतीं थीं तुम्हारी कविताएँ ,
हमें गले लगाकर-पीठ थपथपाकर मिले थे तुम वंचित !
कायनात भी आज फूट फूट कर रो रही है ज़ालिम ,
शायरी के हर फन-छंद -मीटर से सजे थे तुम वंचित !
गर्दिश का ये सिलसिला आज तुम्हें ले गया यहां से,
जामे ऐश पीकर हर अंजुमन में पले थे तुम वंचित !
फलक -जमीं -गुलशन उदास है,दोस्त तेरे चले जाने से,
सिरहाज पे शिर था तुम्हारा,आँख मूंदे ढले थे तुम वंचित !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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