Monday, 6 January 2020

दो   !

क्यों  शोर  मचाते  हो ,बोलने  तो  दो ,
जरा  चुप   रहो, दिल  खोलने  तो  दो। 

सपेरे  ने    अपना ,  खेल  शुरू  किया,
साँप   को   बीन    पर  डोलने  तो  दो। 

भरे बाज़ार  में , इल्ज़ाम मत  लगाओ ,
सच - झूठ को तराज़ू में तोलने तो दो। 

हमने  माना कि ,डूबने  का  खतरा है,
पर  हमें  जिंदादिली से  तैरने  तो  दो। 

वक्त  ने ढाये  कितने  जुल्मो-सितम,
दुआ मत माँगो  ठीक से झेलने तो दो.  

कैसी   खुशनुमा  सुबह  ,वॉक-वे  पर ,   
बातें मत  बनाओ,जरा टहलने तो दो। 

वाह -वाह  कहना,इरशाद  भी  करना,
ग़ज़ल के मिसरे को, टटोलने तो  दो।   
                         ***
-कृष्णकांत  भाटिया 'कान्त '

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