दो !
क्यों शोर मचाते हो ,बोलने तो दो ,
जरा चुप रहो, दिल खोलने तो दो।
सपेरे ने अपना , खेल शुरू किया,
साँप को बीन पर डोलने तो दो।
भरे बाज़ार में , इल्ज़ाम मत लगाओ ,
सच - झूठ को तराज़ू में तोलने तो दो।
हमने माना कि ,डूबने का खतरा है,
पर हमें जिंदादिली से तैरने तो दो।
वक्त ने ढाये कितने जुल्मो-सितम,
दुआ मत माँगो ठीक से झेलने तो दो.
कैसी खुशनुमा सुबह ,वॉक-वे पर ,
बातें मत बनाओ,जरा टहलने तो दो।
वाह -वाह कहना,इरशाद भी करना,
ग़ज़ल के मिसरे को, टटोलने तो दो।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
क्यों शोर मचाते हो ,बोलने तो दो ,
जरा चुप रहो, दिल खोलने तो दो।
सपेरे ने अपना , खेल शुरू किया,
साँप को बीन पर डोलने तो दो।
भरे बाज़ार में , इल्ज़ाम मत लगाओ ,
सच - झूठ को तराज़ू में तोलने तो दो।
हमने माना कि ,डूबने का खतरा है,
पर हमें जिंदादिली से तैरने तो दो।
वक्त ने ढाये कितने जुल्मो-सितम,
दुआ मत माँगो ठीक से झेलने तो दो.
कैसी खुशनुमा सुबह ,वॉक-वे पर ,
बातें मत बनाओ,जरा टहलने तो दो।
वाह -वाह कहना,इरशाद भी करना,
ग़ज़ल के मिसरे को, टटोलने तो दो।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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