ग़ज़ल !
लगागा , लगागा , लगागा , लगागा
हमारी निगाहें समागम करेंगी ,
अकेली अकेली निरंतर बहेंगी।
पराभव मिला है ,जमाना ख़ुशी में,
अज़ीजां करें वो सितम को सहेंगीं।
नशेमन सलामत ,ख़ुशी है हमें भी,
सितम हो -सज़ा हो, फ़िदा ही रहेंगी।
इलाही कभी तो सहारा बनेगा,
कहानी सभी को जुबानी कहेंगी।
पयोधर बरसता , जमीं को बहाये ,
किनारे - किनारे टहलती चलेंगी।
भला हो सभी का दुआ है हमारी,
हमारी जुबाँ से , यही तो रटेंगी.
इनायत -दुआ है -सभी हैं सवाली ,
किसी की नज़र से ,कभी तो पटेंगी।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
लगागा , लगागा , लगागा , लगागा
हमारी निगाहें समागम करेंगी ,
अकेली अकेली निरंतर बहेंगी।
पराभव मिला है ,जमाना ख़ुशी में,
अज़ीजां करें वो सितम को सहेंगीं।
नशेमन सलामत ,ख़ुशी है हमें भी,
सितम हो -सज़ा हो, फ़िदा ही रहेंगी।
इलाही कभी तो सहारा बनेगा,
कहानी सभी को जुबानी कहेंगी।
पयोधर बरसता , जमीं को बहाये ,
किनारे - किनारे टहलती चलेंगी।
भला हो सभी का दुआ है हमारी,
हमारी जुबाँ से , यही तो रटेंगी.
इनायत -दुआ है -सभी हैं सवाली ,
किसी की नज़र से ,कभी तो पटेंगी।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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