Tuesday, 19 May 2020

ग़ज़ल  !

लगागा , लगागा , लगागा , लगागा 

हमारी   निगाहें    समागम    करेंगी ,
अकेली    अकेली   निरंतर     बहेंगी। 

पराभव  मिला  है ,जमाना  ख़ुशी में,
अज़ीजां  करें  वो  सितम को सहेंगीं। 

नशेमन  सलामत ,ख़ुशी  है  हमें भी,
सितम हो -सज़ा  हो, फ़िदा ही रहेंगी। 

इलाही    कभी    तो   सहारा  बनेगा,
कहानी   सभी   को  जुबानी  कहेंगी। 

पयोधर  बरसता , जमीं  को   बहाये ,
किनारे - किनारे   टहलती    चलेंगी। 

भला   हो  सभी   का  दुआ है हमारी,
हमारी  जुबाँ  से ,  यही   तो   रटेंगी.  

इनायत  -दुआ  है -सभी  हैं  सवाली , 
किसी की  नज़र  से ,कभी तो पटेंगी। 
                     ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '







No comments:

Post a Comment