पाँच पुतले !
आधी रात को शहर के पाँच पुतले,
बीच चौराहे पर बैठकर रो रहे थे।
ज्योतिबा बोले :'आखिर मैं हुआ
सिर्फ मालीओंका।'
शिवाजी महाराज बोले :'मैं हुआ
सिर्फ मराठोंका !'
आंबेडकर बोले :'मैं बना सिर्फ
पिछड़े लोगोंका !'
तिलक बोले :'मैं हुआ सिर्फ
चित्त पावन ब्राह्म्णोंका !
गांधीजी ने गले की सिसकी रोकी,
और बोले :'आप सब तो नसीब वाले हैं।
आपकी पीठ के पीछे कोई तो है !
मेरी पीठ के पीछे तो सिर्फ
सरकारी दफ़्तरोंकी दीवालें हैं !!!
***
-मराठी कवि कुसुमाग्रज
-हिंदी अनुवाद -कृष्णकांत भाटिया
'कान्त '
आधी रात को शहर के पाँच पुतले,
बीच चौराहे पर बैठकर रो रहे थे।
ज्योतिबा बोले :'आखिर मैं हुआ
सिर्फ मालीओंका।'
शिवाजी महाराज बोले :'मैं हुआ
सिर्फ मराठोंका !'
आंबेडकर बोले :'मैं बना सिर्फ
पिछड़े लोगोंका !'
तिलक बोले :'मैं हुआ सिर्फ
चित्त पावन ब्राह्म्णोंका !
गांधीजी ने गले की सिसकी रोकी,
और बोले :'आप सब तो नसीब वाले हैं।
आपकी पीठ के पीछे कोई तो है !
मेरी पीठ के पीछे तो सिर्फ
सरकारी दफ़्तरोंकी दीवालें हैं !!!
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-मराठी कवि कुसुमाग्रज
-हिंदी अनुवाद -कृष्णकांत भाटिया
'कान्त '
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