Wednesday, 5 November 2014

                पाँच पुतले !

आधी रात को शहर के पाँच पुतले,
बीच चौराहे पर बैठकर रो  रहे थे। 

ज्योतिबा बोले :'आखिर मैं हुआ 
सिर्फ मालीओंका।'

शिवाजी महाराज बोले :'मैं हुआ 
सिर्फ मराठोंका !'

आंबेडकर बोले :'मैं बना सिर्फ 
पिछड़े लोगोंका !'

तिलक बोले :'मैं हुआ सिर्फ 
चित्त पावन ब्राह्म्णोंका !

गांधीजी ने गले की सिसकी रोकी,
और बोले :'आप सब तो नसीब वाले हैं। 

आपकी पीठ के पीछे कोई तो है !
मेरी पीठ के पीछे तो सिर्फ 
सरकारी दफ़्तरोंकी दीवालें हैं !!!
                ***
-मराठी कवि कुसुमाग्रज 
-हिंदी अनुवाद -कृष्णकांत भाटिया 
'कान्त '

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