ग़ज़ल
तेरे सामने मुझे ग़ज़ल गानी है,
ग्रहण में भी चाँदनी सजानी है !
शब्द, शराब से बन गया है पानी,
मीरां तो श्याम की ही दीवानी है !
काफ़िये रदीफ़ को साथ लेकर ,
कमबख्त मायूसी को हरानी है !
तेरे आग़ोश में मैं पिघल गया,
यही बात की तो मुझे परेशानी है !
मन ही मन में मैं तड़प रहा हुँ ,
सोच रहा हुँ ये कैसी नादानी है !
दिल के दर्द बेचता हुँ शायर हुँ ,
कलम की ताक़त आज बतानी है !
महफ़िल में इरशाद का भूखा नहीं ,
दर्द है - उसकी आँख में पानी है !
***
-'कान्त '
तेरे सामने मुझे ग़ज़ल गानी है,
ग्रहण में भी चाँदनी सजानी है !
शब्द, शराब से बन गया है पानी,
मीरां तो श्याम की ही दीवानी है !
काफ़िये रदीफ़ को साथ लेकर ,
कमबख्त मायूसी को हरानी है !
तेरे आग़ोश में मैं पिघल गया,
यही बात की तो मुझे परेशानी है !
मन ही मन में मैं तड़प रहा हुँ ,
सोच रहा हुँ ये कैसी नादानी है !
दिल के दर्द बेचता हुँ शायर हुँ ,
कलम की ताक़त आज बतानी है !
महफ़िल में इरशाद का भूखा नहीं ,
दर्द है - उसकी आँख में पानी है !
***
-'कान्त '
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