ग़ज़ल
सदियों से चौराहे पर ईमान बिक रहा है,
आज़ भी पांचाली का मान बिक रहा है।
सरकार किसी की भी हो ,कोई फर्क नहीं,
कहीं प्रधान , कहीं इन्सान बिक रहा है।
मैं भी हिस्सेदार हूँ ,सड़ी हुई सिस्टम का,
मेरी चुप्पी से, हिन्दुस्तान बिक रहा है।
हरजाना भुगतना पड़ता है इंसानियत को,,
हर-फन-मौला, बे-ज़ुबान बिक रहा है।
हस्तामलक नहीं कर पाये हम हया को,
बे-शरमी का सौदा,आन बान बिक रहा है।
काबों ने अर्जुन को लूटा था और बात थी,
आज़ सव्यसाची -तीर कमान बिक रहा है।
***
-'कान्त '
सदियों से चौराहे पर ईमान बिक रहा है,
आज़ भी पांचाली का मान बिक रहा है।
सरकार किसी की भी हो ,कोई फर्क नहीं,
कहीं प्रधान , कहीं इन्सान बिक रहा है।
मैं भी हिस्सेदार हूँ ,सड़ी हुई सिस्टम का,
मेरी चुप्पी से, हिन्दुस्तान बिक रहा है।
हरजाना भुगतना पड़ता है इंसानियत को,,
हर-फन-मौला, बे-ज़ुबान बिक रहा है।
हस्तामलक नहीं कर पाये हम हया को,
बे-शरमी का सौदा,आन बान बिक रहा है।
काबों ने अर्जुन को लूटा था और बात थी,
आज़ सव्यसाची -तीर कमान बिक रहा है।
***
-'कान्त '
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