Friday, 30 December 2016

ग़ज़ल 

सदियों  से  चौराहे  पर ईमान  बिक रहा है,
आज़  भी  पांचाली  का  मान  बिक रहा है। 

सरकार  किसी की  भी  हो ,कोई फर्क नहीं,
कहीं प्रधान , कहीं   इन्सान  बिक  रहा  है। 

मैं  भी  हिस्सेदार  हूँ ,सड़ी हुई सिस्टम का,
मेरी  चुप्पी से, हिन्दुस्तान  बिक  रहा   है। 

हरजाना  भुगतना पड़ता है  इंसानियत को,,
हर-फन-मौला,  बे-ज़ुबान   बिक   रहा   है। 

हस्तामलक  नहीं कर पाये  हम  हया  को,
बे-शरमी का सौदा,आन बान  बिक रहा है। 

काबों  ने अर्जुन को लूटा था  और बात थी,
आज़ सव्यसाची -तीर कमान बिक रहा है। 
                         ***
-'कान्त '



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