ग़ज़ल
गर्दिश से निकलकर ,आ शके तो आ तू,
अपने आप बढ़कर आ शके तो आ तू।
सुकून नहीं मिलता, कभी मुहब्बत में,
तगाफूलसे बचकर ,आ शके तो आ तू।
क़यामत भी आ जाती है चाहनेवालों पे ,
हमनवाओं में मिलकर,आ शके तो आ तू।
नशेमन बनाएँगे हम दोनों फ़लक पर,
दिलेपूर आरजू लेकर,आ शके तो आ तू।
बुतक़दे में अब भगवान नहीं रहते,
कैदे हयातको तोड़कर,आ शके तो आ तू।
बज़म में आज हमें चाहनेवाले आये हैं ,
जामे ऐश भरकर, आ शके तो आ तू।
बंदिशे इस ग़ज़ल की, दिले -खराश हैं ,
यही इज़हार सुनकर,आ शके तो आ तू।
***
-'कान्त'
गर्दिश से निकलकर ,आ शके तो आ तू,
अपने आप बढ़कर आ शके तो आ तू।
सुकून नहीं मिलता, कभी मुहब्बत में,
तगाफूलसे बचकर ,आ शके तो आ तू।
क़यामत भी आ जाती है चाहनेवालों पे ,
हमनवाओं में मिलकर,आ शके तो आ तू।
नशेमन बनाएँगे हम दोनों फ़लक पर,
दिलेपूर आरजू लेकर,आ शके तो आ तू।
बुतक़दे में अब भगवान नहीं रहते,
कैदे हयातको तोड़कर,आ शके तो आ तू।
बज़म में आज हमें चाहनेवाले आये हैं ,
जामे ऐश भरकर, आ शके तो आ तू।
बंदिशे इस ग़ज़ल की, दिले -खराश हैं ,
यही इज़हार सुनकर,आ शके तो आ तू।
***
-'कान्त'
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