एक शाम कविता के नाम !
दिले बीमार , सही हो वो दवाएँ दे दे ,
मैं सब पे प्यार लुटाऊँ ,वो दुआऍं दे दे।
अय मेरे रब मैं ,साँस साँस में महक जाऊँ ,
मेरी आवाज़ की खुश्बू को ,तू हवाएँ दे दे !
आज शाम, आसमान में बादल गरज़ रहे थे ; बारिस भी हो रही थी।
अजितभाई मानसत्ता के बंगले ' कर्मयोग ' के परिसर में बैठ चार
कवि कविता के माध्यम से ,चमकती हुई बिजली को अपने आगोश
में लेने का प्रयास कर रहे थे। क्यों कि आज की शाम उन्होंने कविता
के नाम लिखी थी।
पत्तों में जिस तरह शबनम छिपी रहती है ;उसी तरह कविता में
आँसू छिप जाते हैं। और कविओं के संवाद में हास्य,व्यंग,करुणा तीनों
का प्राकट्य होता है। ई -मेईल ,मोबाइल और इंटरनेट से दूर गुज़ारे
ये लम्हे सचमुच बहोत ही खूबसूरत थे।
कविता थी हमारे सामने ,शब्द थे हमारे साथ,
मनकमल में पिया बिराजे, फिर क्या लिखूं नाथ !
जो कुछ भी उत्तम था उसे हमने एक दूसरे के साथ बाँटा। पूरा
विश्व अकेला था हम साथ-साथ थे। हम अपने आप से बाहर निकल
आए थे।
आज़ सड़कों पे निकल आओ तो दिल बहलेगा ,
चंद ग़ज़लों से ये तन्हाई नहीं जानेवाली !
-दुष्यंतकुमार
पत्थर ही मुझ पे फेंकता आया है सालभर,
होली का दिन है ज़ालिम ,आज गुलाल फेंक।
- अदम
मेरी हर इक साँस में, है एक उपन्यास,
कोई कतरन नहीं हूँ , मैं किसी अख़बार की।
-महादेवी वर्मा
अपनी लिखी कविताएँ ,मशहूर कविओं की लिखी कविताओंका
दौर पूरे तीन घंटे चलता रहा। आज की शाम की साँसें थीं कवि
मदनकुमार अंजारिया 'खाव्ब ' की पेशकश,अजितभाई मानसत्ता का
अपना अलग अंदाज़, कृष्णकांत भाटिया 'कान्त 'की सोच और कनुभाई
जोशी की मौजूदगी !
***
*प्रस्तुति -'कान्त '
*12 अप्रेल, गुरूवार ,2018 ,भुज-कच्छ
दिले बीमार , सही हो वो दवाएँ दे दे ,
मैं सब पे प्यार लुटाऊँ ,वो दुआऍं दे दे।
अय मेरे रब मैं ,साँस साँस में महक जाऊँ ,
मेरी आवाज़ की खुश्बू को ,तू हवाएँ दे दे !
आज शाम, आसमान में बादल गरज़ रहे थे ; बारिस भी हो रही थी।
अजितभाई मानसत्ता के बंगले ' कर्मयोग ' के परिसर में बैठ चार
कवि कविता के माध्यम से ,चमकती हुई बिजली को अपने आगोश
में लेने का प्रयास कर रहे थे। क्यों कि आज की शाम उन्होंने कविता
के नाम लिखी थी।
पत्तों में जिस तरह शबनम छिपी रहती है ;उसी तरह कविता में
आँसू छिप जाते हैं। और कविओं के संवाद में हास्य,व्यंग,करुणा तीनों
का प्राकट्य होता है। ई -मेईल ,मोबाइल और इंटरनेट से दूर गुज़ारे
ये लम्हे सचमुच बहोत ही खूबसूरत थे।
कविता थी हमारे सामने ,शब्द थे हमारे साथ,
मनकमल में पिया बिराजे, फिर क्या लिखूं नाथ !
जो कुछ भी उत्तम था उसे हमने एक दूसरे के साथ बाँटा। पूरा
विश्व अकेला था हम साथ-साथ थे। हम अपने आप से बाहर निकल
आए थे।
आज़ सड़कों पे निकल आओ तो दिल बहलेगा ,
चंद ग़ज़लों से ये तन्हाई नहीं जानेवाली !
-दुष्यंतकुमार
पत्थर ही मुझ पे फेंकता आया है सालभर,
होली का दिन है ज़ालिम ,आज गुलाल फेंक।
- अदम
मेरी हर इक साँस में, है एक उपन्यास,
कोई कतरन नहीं हूँ , मैं किसी अख़बार की।
-महादेवी वर्मा
अपनी लिखी कविताएँ ,मशहूर कविओं की लिखी कविताओंका
दौर पूरे तीन घंटे चलता रहा। आज की शाम की साँसें थीं कवि
मदनकुमार अंजारिया 'खाव्ब ' की पेशकश,अजितभाई मानसत्ता का
अपना अलग अंदाज़, कृष्णकांत भाटिया 'कान्त 'की सोच और कनुभाई
जोशी की मौजूदगी !
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*प्रस्तुति -'कान्त '
*12 अप्रेल, गुरूवार ,2018 ,भुज-कच्छ
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