Thursday, 12 April 2018

आओ   !

आओ  पास   बैठकर,  चेतना   नई  भरें ,
एकबार   फिर   से   सोचना   शुरू   करें। 

किस  पथ पे चले , कहाँ  रुक गए  हम ?
हमारी  सोच  में ,आज भी है  क्या  दम  ?

चलने की जब ठान ली, पथ से क्यों डरें ?
एकबार    फिर   से   सोचना  शुरू  करें। 

ऊँचा  रहेगा ये शीश ,जो न  झुका  कभी,
आ  भी जाओ तुम , छोड़  धारणा  सभी। 

अपना गुरुर बेचकर ,क्या मन में ही मरें ?
एकबार     फिरसे    सोचना    शुरू   करें। 

आंसू   बहा   न  तू,   परंपरा  शरमाएगी ,
पागल  दुनिया, घाव पे नमक लगाएगी। 

पहचान अपने रूप को,ये   दुविधाएँ  हरें ,
एकबार    फिरसे    सोचना    शुरू   करें।     
                         ***    
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त ' 


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