आओ !
आओ पास बैठकर, चेतना नई भरें ,
एकबार फिर से सोचना शुरू करें।
किस पथ पे चले , कहाँ रुक गए हम ?
हमारी सोच में ,आज भी है क्या दम ?
चलने की जब ठान ली, पथ से क्यों डरें ?
एकबार फिर से सोचना शुरू करें।
ऊँचा रहेगा ये शीश ,जो न झुका कभी,
आ भी जाओ तुम , छोड़ धारणा सभी।
अपना गुरुर बेचकर ,क्या मन में ही मरें ?
एकबार फिरसे सोचना शुरू करें।
आंसू बहा न तू, परंपरा शरमाएगी ,
पागल दुनिया, घाव पे नमक लगाएगी।
पहचान अपने रूप को,ये दुविधाएँ हरें ,
एकबार फिरसे सोचना शुरू करें।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
आओ पास बैठकर, चेतना नई भरें ,
एकबार फिर से सोचना शुरू करें।
किस पथ पे चले , कहाँ रुक गए हम ?
हमारी सोच में ,आज भी है क्या दम ?
चलने की जब ठान ली, पथ से क्यों डरें ?
एकबार फिर से सोचना शुरू करें।
ऊँचा रहेगा ये शीश ,जो न झुका कभी,
आ भी जाओ तुम , छोड़ धारणा सभी।
अपना गुरुर बेचकर ,क्या मन में ही मरें ?
एकबार फिरसे सोचना शुरू करें।
आंसू बहा न तू, परंपरा शरमाएगी ,
पागल दुनिया, घाव पे नमक लगाएगी।
पहचान अपने रूप को,ये दुविधाएँ हरें ,
एकबार फिरसे सोचना शुरू करें।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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