Friday, 22 March 2019




ग़ज़ल  
लगागा ,लगागा,लगागा ,लगागा 

हमें   सोचना  आ  गया  है  अभी  से,
घना  कोहरा  छा  गया  है  अभी  से। 

चले    जा   रहे  हैं ,  हमें   चाहते  थे,
बसेरा  यहाँ  भा   गया  है  अभी  से। 

कि  तेरा  इश्क  है  ,कली  मोगरे की,
मदन ही  उसे  पा  गया  है  अभी से। 

ग़ज़ल भी फलक में ,बसेरा  करे जो,
अब्र  ही  उसे   गा  गया  है अभी से। 

किसीकी  जबानी ,सुनी  जा रही  है ,
नशे मन  नशा आ गया है अभी से। 
                     ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '






No comments:

Post a Comment