देख रहा हूँ !
देश की पावन मिटटी पर ,
अटलजी के चरण चिन्ह रतनारे मैं देख रहा हूँ !
उनकी कविताओं के शब्दों को मैं सोच रहा हूँ !
देखूं ,तृप्त करूं मेरी आँखों को,
कोई भुला नहीं शकता -मिटा नहीं शकता ,
वाजपेयी की आवाज़ की बरसातों को।
नदियों की बहती जलधारा में छवि
उनकी मैं देख रहा हूँ !
०देश....
प्रति क्षण समय पंख पसारे,
आती -जाती ऋतुओं के बीच
अटलजी को ही वो पुकारे।
सागर की गहराई में ,पके मोतियों
को मै देख रहा हूँ !
0 देश .....
आज मुझे वाजपेयी के युग ने कुछ सुनाया,
घुट घुट के मर जानेवाली बातों को दोहराया
कितने रूप दबे हैं कुटिल राजनीती में ,
कौन कौरव ?कौन पांडव ?विचारधारा में
वाजपेयी को सिसकते मैं देख रहा हूँ !
0 देश.....
लाखों आशाओं को साँसों में भर के,
अटलजी...स्वर्ग सिधारे
सत्ता के कूट ज़ाल में हो जाते थे
कभी कभी वो भी बिचारे
कितने रूप दबे थे इस राजनेता के
खोल खोल कर ,दिल्ही का वो पिटारा मैं देख रहा हूँ !
०देश ...
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
देश की पावन मिटटी पर ,
अटलजी के चरण चिन्ह रतनारे मैं देख रहा हूँ !
उनकी कविताओं के शब्दों को मैं सोच रहा हूँ !
देखूं ,तृप्त करूं मेरी आँखों को,
कोई भुला नहीं शकता -मिटा नहीं शकता ,
वाजपेयी की आवाज़ की बरसातों को।
नदियों की बहती जलधारा में छवि
उनकी मैं देख रहा हूँ !
०देश....
प्रति क्षण समय पंख पसारे,
आती -जाती ऋतुओं के बीच
अटलजी को ही वो पुकारे।
सागर की गहराई में ,पके मोतियों
को मै देख रहा हूँ !
0 देश .....
आज मुझे वाजपेयी के युग ने कुछ सुनाया,
घुट घुट के मर जानेवाली बातों को दोहराया
कितने रूप दबे हैं कुटिल राजनीती में ,
कौन कौरव ?कौन पांडव ?विचारधारा में
वाजपेयी को सिसकते मैं देख रहा हूँ !
0 देश.....
लाखों आशाओं को साँसों में भर के,
अटलजी...स्वर्ग सिधारे
सत्ता के कूट ज़ाल में हो जाते थे
कभी कभी वो भी बिचारे
कितने रूप दबे थे इस राजनेता के
खोल खोल कर ,दिल्ही का वो पिटारा मैं देख रहा हूँ !
०देश ...
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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