Friday, 16 August 2019

यादें  !

सारी  यादें ,उमड़ ---घुमड़  कर  आ गईं ,
मेरे   मन   में,  शीतल   जल बरसा गईं। 

वो चंचल -शीतल-निर्मल   तेरा   चेहरा ,
उसके    ऊपर    नकाब    का था  पहरा। 

मेरी  ड्योडी  पर,काली घटायें  छा  गईं ,
मेरे    मन  में ,शीतल   जल बरसा गईं। 

चाँद  निकलता ,सितारे भी झगमगाते ,
हँस -हँस  कर  मुझे अपने पास बुलाते। 

आँख मिचोली  घने बादलों की भा गई,
मेरे    मन  में , शीतल जल बरसा गईं। 

शाम सुहानी-मस्तानी, की   मनमानी,
कायनात   भी    हो   गई   थी दीवानी। 

प्रेम पियाले  की  अमृत   बूंदें   भा गईं ,
मेरे   मन   में, शीतल  जल बरसा गईं। 
                        ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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