यादें !
सारी यादें ,उमड़ ---घुमड़ कर आ गईं ,
मेरे मन में, शीतल जल बरसा गईं।
वो चंचल -शीतल-निर्मल तेरा चेहरा ,
उसके ऊपर नकाब का था पहरा।
मेरी ड्योडी पर,काली घटायें छा गईं ,
मेरे मन में ,शीतल जल बरसा गईं।
चाँद निकलता ,सितारे भी झगमगाते ,
हँस -हँस कर मुझे अपने पास बुलाते।
आँख मिचोली घने बादलों की भा गई,
मेरे मन में , शीतल जल बरसा गईं।
शाम सुहानी-मस्तानी, की मनमानी,
कायनात भी हो गई थी दीवानी।
प्रेम पियाले की अमृत बूंदें भा गईं ,
मेरे मन में, शीतल जल बरसा गईं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
सारी यादें ,उमड़ ---घुमड़ कर आ गईं ,
मेरे मन में, शीतल जल बरसा गईं।
वो चंचल -शीतल-निर्मल तेरा चेहरा ,
उसके ऊपर नकाब का था पहरा।
मेरी ड्योडी पर,काली घटायें छा गईं ,
मेरे मन में ,शीतल जल बरसा गईं।
चाँद निकलता ,सितारे भी झगमगाते ,
हँस -हँस कर मुझे अपने पास बुलाते।
आँख मिचोली घने बादलों की भा गई,
मेरे मन में , शीतल जल बरसा गईं।
शाम सुहानी-मस्तानी, की मनमानी,
कायनात भी हो गई थी दीवानी।
प्रेम पियाले की अमृत बूंदें भा गईं ,
मेरे मन में, शीतल जल बरसा गईं।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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