Thursday, 15 August 2019

चल पड़ा था  !

 चल पड़ा   था उस  सफ़र पर ,मैं  मंज़िल  पाने को,
पता  न  था कहीं  सहरा ,कहीं  समंदर  आयेंगे 
मैं  हर रास्ते  पर लोगों से रिश्ता जताने चला,
पता न था फल आने पर ये  पत्थर भी मारेंगे। 

आँसू  यूँ ही  नहीं  उमड़ते, इन झील सी  काली आँखों में,
दर्द  झेलना  पड़ता  है, दिल  पर ,
आसान  नहीं  कश्तियों को  संभालना तूफानों में 
टीश उठी जब छेद किया किसी अपने ने। 

खुश हो रहा था मैं पले -फले ,मेरी छांव में 
उस फल को देखकर 
दर्द हुआ तब,जब पत्थर मारा उसे मेरे अपनों ने। 
जगह दी मैंने हर एक -एक को  मेरे दिल में ,
दर्द हुआ तब ,जब सभीने मिलकर कहा ,जगह कहाँ है !

उत्ताप  लिए  घूम रहा हूं  मैं  जीवनभर 
मगर शांत हुआ तब जब बैठा मैं 
कलकल बहते झरनों के साये में 
पूछा मैंने उन झरनों से ,वजह बता दो   आवाज़ की 

कहा  उन शीत  झरनों ने -
'पत्त्थरों  की चोटें  हमने भी झेली हैं  'अजित '
 मगर पनाह नहीं दी दिल में इन चोटों को 
नाचते-गेट-बहते हुए ये संकल्प लेकर 
कभी जगह मिल जाएगी ,हमें  भी उमड़ती नदियों में,
समा जायेंगे  ख़ुशी ख़ुशी हम भी उन सदियों में। 

बस  उनकी ये बात ,मेरे जीने की वज़ह बन गई,
मेरे पथ पर पतझड़ भी हरियाली बन कर  सज़  गई 
अब न कोई शिकवा ,न कोई शिकायत मन में,
गूंज उठी गीतों की लहर,मेरे पथ पर शहनाई  बज गई !
                                     ***
-अजित मानसत्ता  'अजित '




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