Wednesday, 14 August 2019

देख रहा हूँ  !

आजादी  के स्वर्णिम  अवसर पर ,
भारतमाता के चरण-चिन्ह रतनारे देख रहा हूँ !
कश्मीर की घाटियों में  अमन -उजियारा छाया ,
पृथ्वी की इस जन्नत के सजे  सितारे देख रहा हूँ !

प्रतिक्षण  मौसम  गीत ख़ुशी के  गाये,
ऋतुओं  का  नया रूप ,हर किसीको भाये। 
बिजली कौंधे,सावन बरसे  रिमझिम ,
बीच  बदरिया  रंगीला मेघधनुष्य  छाये 
भूतान  के नाचते -गाते  मतवाले देख रहा हूँ !
                                                       0 पृथ्वी.. 

नदियों की जलधारा-दालसरोवर का  रूप निराला,
कश्मीरियों का  एक-दूजे को पिलाना प्रेम पियाला। 
चोर पवन झनकार  चुराकर  देखो कैसा भागे,
बच्चे -बूढ़े-लिए तिरंगा चलते है  सबसे आगे। 
खड़े पैर  इस धरती पर भारत के रखवाले देख रहा हूँ !
                                                        0 पृथ्वी .. 
कश्मीर हमारा जान से प्यारा,बहे यहाँ प्रेम की धारा ,
बीत गए वो दिन ,जलती थी जब नफरत की ज्वाला। 
नया काफिला ,नए रंग ,रहेंगे अब सब संग संग ,
छपन्न की छाती वाले ने  370 कर  दी है भंग। 
नरेंद्र की आंखोमे ,नया सूरज-नए चाँद-सितारे देख रहा हूँ !
0 पृथ्वी.... 
                                     ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '


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