Saturday, 16 June 2018

ग़ज़ल 

 तुम    पुकारो    तो   एक    बार  मुझे,
मौत     की    हद   से   लौट   आऊंगा  !

चरागों    की   रोशनी   ही    काफी  है,
आँगन   में,  मैं    दिया     जलाऊंगा !

चाँदनी  के  ज़िस्म  में खुशबू  है  तेरी,
पाकीज़ा  बिस्तर  में ,तुझे  सताऊंगा !

अभी  दूर  हैं   कुछ   खूबसूरत   लम्हे ,
आवाज़    देके    मैं   उन्हें   बुलाऊंगा !

मदहोश   हो  जाए  ये   सारा  आलम,
जामे   अश्क़   आँखों   से  पिलाऊंगा !

मैंने   देखी   नहीं  कभी  ख़ुशी  तन्हा,
साथ  बैठे  ग़म  को  भी   सहलाऊंगा !

तेरी  रंगीनियों का आशिक  है शायर,
आ  भी  जा,  ग़ज़ल  तुझे  सुनाऊंगा !
                      ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '







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