ग़ज़ल
तुम पुकारो तो एक बार मुझे,
मौत की हद से लौट आऊंगा !
चरागों की रोशनी ही काफी है,
आँगन में, मैं दिया जलाऊंगा !
चाँदनी के ज़िस्म में खुशबू है तेरी,
पाकीज़ा बिस्तर में ,तुझे सताऊंगा !
अभी दूर हैं कुछ खूबसूरत लम्हे ,
आवाज़ देके मैं उन्हें बुलाऊंगा !
मदहोश हो जाए ये सारा आलम,
जामे अश्क़ आँखों से पिलाऊंगा !
मैंने देखी नहीं कभी ख़ुशी तन्हा,
साथ बैठे ग़म को भी सहलाऊंगा !
तेरी रंगीनियों का आशिक है शायर,
आ भी जा, ग़ज़ल तुझे सुनाऊंगा !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
तुम पुकारो तो एक बार मुझे,
मौत की हद से लौट आऊंगा !
चरागों की रोशनी ही काफी है,
आँगन में, मैं दिया जलाऊंगा !
चाँदनी के ज़िस्म में खुशबू है तेरी,
पाकीज़ा बिस्तर में ,तुझे सताऊंगा !
अभी दूर हैं कुछ खूबसूरत लम्हे ,
आवाज़ देके मैं उन्हें बुलाऊंगा !
मदहोश हो जाए ये सारा आलम,
जामे अश्क़ आँखों से पिलाऊंगा !
मैंने देखी नहीं कभी ख़ुशी तन्हा,
साथ बैठे ग़म को भी सहलाऊंगा !
तेरी रंगीनियों का आशिक है शायर,
आ भी जा, ग़ज़ल तुझे सुनाऊंगा !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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