हेवानियत !
हेवानियत की ये कैसी आँधी चली है ?
कुचल दी गई, इक मासूम कली है !
हँसती खेलती बच्ची को मिटा डाला,
आज कायनात भी , चुपचाप खड़ी है !
जिसको अक्सर हम , इंसान कहते हैं ,
उसीके जुल्म से , ये घटना घटी है !
इस दौर में, ये बेटियाँ कैसे जियेंगी ?
दुःशासन भी रोया,ये कातिल घड़ी है !
जागो संस्कृति की गुहार लगानेवालो ,
सामने जूताखोर ताकतें , चल पड़ी हैं !
ये शहर -गाँव जहरीले होते जा रहे हैं ,
घटनाओं की फ़ेहरिस्त, बड़ी से बड़ी है !
लोग, यूँ शैतान क्यूँ बन जाते हैं ?
दीवाल पे कृष्ण की छवि टँगी है !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
हेवानियत की ये कैसी आँधी चली है ?
कुचल दी गई, इक मासूम कली है !
हँसती खेलती बच्ची को मिटा डाला,
आज कायनात भी , चुपचाप खड़ी है !
जिसको अक्सर हम , इंसान कहते हैं ,
उसीके जुल्म से , ये घटना घटी है !
इस दौर में, ये बेटियाँ कैसे जियेंगी ?
दुःशासन भी रोया,ये कातिल घड़ी है !
जागो संस्कृति की गुहार लगानेवालो ,
सामने जूताखोर ताकतें , चल पड़ी हैं !
ये शहर -गाँव जहरीले होते जा रहे हैं ,
घटनाओं की फ़ेहरिस्त, बड़ी से बड़ी है !
लोग, यूँ शैतान क्यूँ बन जाते हैं ?
दीवाल पे कृष्ण की छवि टँगी है !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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