Friday, 29 June 2018

हेवानियत  !

हेवानियत  की  ये  कैसी  आँधी  चली  है ?
कुचल  दी  गई,   इक   मासूम   कली  है !

हँसती  खेलती  बच्ची  को  मिटा  डाला,
आज  कायनात  भी , चुपचाप  खड़ी  है !

जिसको  अक्सर  हम , इंसान  कहते हैं ,
उसीके  जुल्म  से , ये  घटना   घटी   है !

इस  दौर  में, ये  बेटियाँ  कैसे  जियेंगी ?
दुःशासन भी रोया,ये   कातिल  घड़ी है ! 

जागो  संस्कृति की गुहार  लगानेवालो ,
सामने  जूताखोर  ताकतें , चल पड़ी हैं  !

ये  शहर -गाँव  जहरीले होते जा रहे हैं ,
घटनाओं की फ़ेहरिस्त, बड़ी से बड़ी है !

लोग, यूँ   शैतान  क्यूँ   बन  जाते   हैं ?
दीवाल  पे  कृष्ण  की    छवि  टँगी  है !
                      ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '



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