योग !
नई उर्ज़ा नए प्राण , संचित करता है योग,
अनुचित बहती साँसों को उचित करता है योग !
कपालभारती ,अनुलोम विलोम ,हो कोई भी मुद्रा ,
शरीर में बसे रोगों को विचलित करता है योग !
मुँह -अँधरे ,मुँह -उजाले ,जीवनदाता वायु बहता है,
आसन जमा के बैठो, कुछ सूचित करता है योग !
ऋषिओं की दी ये धरोहर ,बड़ी अनमोल है भैया,
पूर्वापर -पूर्वोक्त बातों को,प्रचलित करता है योग !
आ जाओ संकल्प करें , सब भारतवासी मिलकर,
'कान्त 'के तन-मन को, आमंत्रित करता है योग !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
नई उर्ज़ा नए प्राण , संचित करता है योग,
अनुचित बहती साँसों को उचित करता है योग !
कपालभारती ,अनुलोम विलोम ,हो कोई भी मुद्रा ,
शरीर में बसे रोगों को विचलित करता है योग !
मुँह -अँधरे ,मुँह -उजाले ,जीवनदाता वायु बहता है,
आसन जमा के बैठो, कुछ सूचित करता है योग !
ऋषिओं की दी ये धरोहर ,बड़ी अनमोल है भैया,
पूर्वापर -पूर्वोक्त बातों को,प्रचलित करता है योग !
आ जाओ संकल्प करें , सब भारतवासी मिलकर,
'कान्त 'के तन-मन को, आमंत्रित करता है योग !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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