Saturday, 21 March 2020

कविता  !

लगता  है  आज  ,कविता  लिख  ही डालूँ ,
उमड़   रही   संवेदनाओं   को  कैसे  टालूँ  ?

पूरा  देश कोरोना से ,डटकर  झूज  रहा है,
मोदीजी ने जो माँगा है, उसे  बूझ  रहा  है। 

हाथ  बराबर  धो   कर ,चल  मैं  नहा  लूँ,
उमड़  रही   संवेदनाओं  को    कैसे  टालूँ  ?

कविता  जीवन का चित्रण  नहीं,दर्पण है,
देश  के  लिए ,मेरा   सब  कुछ  अर्पण है। 

देशवासियों  की वेदनाओं को ,मैं  पा लूँ ,
उमड़   रही   संवेदनाओं  को  कैसे टालूँ  ?

बंद नहीं मैं कमरे में,कमरा मुझ में बंद। 
लिख डालूँगा - अल्फ़ाज़  आज  मैं  चंद। 

नाच-कूदकर  , गीत   जीवन के  गा  लूँ ,
उमड़  रही   संवेदनाओं  को ,कैसे  टालूँ  ?
                       ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '


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