रमज़ान में !
कर खुदाकी बंदगी रमज़ान में,
हौंसला मत छोड़ना तूफ़ान में।
रब कहो अल्ला कहो मौला कहो ,
नूर उसका बसता है इंसान में।
एकरार कर लो, आँसू ही धर दो,
प्यार का दरिया बहे जबान में।
परवरदिगार पीरों का तलबगार,
ख़ुश्बू आती है उसीकी लुबान में।
हज़रतअली ,इंसानियत के धनी,
सब कुछ कहा ,उन्होंने कुरान में।
रोज़ा रखे नमाजी, नमाज पढ़,
भूल खुद को खुदा के ध्यान में।
हामिल है तू ,ताकत है तू,शूर की,
सबकुछ समाया इन्हीके ज्ञान में।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
कर खुदाकी बंदगी रमज़ान में,
हौंसला मत छोड़ना तूफ़ान में।
रब कहो अल्ला कहो मौला कहो ,
नूर उसका बसता है इंसान में।
एकरार कर लो, आँसू ही धर दो,
प्यार का दरिया बहे जबान में।
परवरदिगार पीरों का तलबगार,
ख़ुश्बू आती है उसीकी लुबान में।
हज़रतअली ,इंसानियत के धनी,
सब कुछ कहा ,उन्होंने कुरान में।
रोज़ा रखे नमाजी, नमाज पढ़,
भूल खुद को खुदा के ध्यान में।
हामिल है तू ,ताकत है तू,शूर की,
सबकुछ समाया इन्हीके ज्ञान में।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '