Thursday, 9 January 2014

-------------गीत --------------
चुप बैठा कोई रे जीवन सितार में ,
चाहूँ  उतरे मेरे स्वर के निखार में !

जगी साँसें मेरी,जीने को नई आशा,
सपने संझोये हैं ,मन के दरबार में !

चलता रहा हुँ ,न रुका बीच रास्ते में ,
भटका न मैं कहीं मौसमे  बहार में !

जमाने का कभी सजदा किया नहीं ,
बिक चुके सारे मोती भरे बाजार में !

'फलक 'जैसे रखोगे वैसे ही हम रहेंगे,
कोई शिकायत नहीं, तेरे इस संसार में !
------------------------------------
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक'
++++++++++++++++++++++++ 

 

No comments:

Post a Comment