-------------गीत --------------
चुप बैठा कोई रे जीवन सितार में ,
चाहूँ उतरे मेरे स्वर के निखार में !
जगी साँसें मेरी,जीने को नई आशा,
सपने संझोये हैं ,मन के दरबार में !
चलता रहा हुँ ,न रुका बीच रास्ते में ,
भटका न मैं कहीं मौसमे बहार में !
जमाने का कभी सजदा किया नहीं ,
बिक चुके सारे मोती भरे बाजार में !
'फलक 'जैसे रखोगे वैसे ही हम रहेंगे,
कोई शिकायत नहीं, तेरे इस संसार में !
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-कृष्णकांत भाटिया 'फलक'
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