ज़िंदगी !
पता बदलती रहती है ज़िंदगी ,
यूँ ही मचलती रहती है ज़िंदगी।
कोई नाखुश इससे क्यों हो ?
मुहब्बत करती रहती है ज़िंदगी।
मौत की अमानत है ये सदियों से,
साँसों में खेलती रहती है ज़िंदगी।
माँगें तो भला इससे क्या माँगें ?
खुद ही देती रहती है ज़िंदगी।
दुपट्टा ओढ़ा है इसने खुशियों का,
हँसती -हँसाती रहती है ज़िंदगी।
या रब तेरी रहमियत से मिली है,
वरना बहती रहती है ज़िंदगी।
कैदेहयात खूबसूरत लगती है,
सरपट दौड़ती रहती है ज़िंदगी।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
पता बदलती रहती है ज़िंदगी ,
यूँ ही मचलती रहती है ज़िंदगी।
कोई नाखुश इससे क्यों हो ?
मुहब्बत करती रहती है ज़िंदगी।
मौत की अमानत है ये सदियों से,
साँसों में खेलती रहती है ज़िंदगी।
माँगें तो भला इससे क्या माँगें ?
खुद ही देती रहती है ज़िंदगी।
दुपट्टा ओढ़ा है इसने खुशियों का,
हँसती -हँसाती रहती है ज़िंदगी।
या रब तेरी रहमियत से मिली है,
वरना बहती रहती है ज़िंदगी।
कैदेहयात खूबसूरत लगती है,
सरपट दौड़ती रहती है ज़िंदगी।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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