Thursday, 11 January 2018

ज़िंदगी  !

पता   बदलती  रहती   है  ज़िंदगी ,
यूँ  ही मचलती  रहती  है  ज़िंदगी। 

कोई   नाखुश    इससे   क्यों   हो ?
मुहब्बत करती रहती  है  ज़िंदगी। 

मौत की अमानत है ये सदियों से,
साँसों  में खेलती रहती है ज़िंदगी। 

माँगें  तो  भला  इससे  क्या  माँगें ?
खुद   ही  देती   रहती   है  ज़िंदगी। 

दुपट्टा ओढ़ा  है  इसने खुशियों का,
हँसती -हँसाती  रहती  है  ज़िंदगी। 

या  रब तेरी रहमियत से मिली है,
वरना    बहती   रहती  है  ज़िंदगी। 

कैदेहयात   खूबसूरत   लगती  है,
सरपट   दौड़ती  रहती  है ज़िंदगी। 
                     ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '















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