Tuesday, 16 January 2018

ग़ज़ल 

ना    बेरुखी  से   मुझे,  इस  तरह मुखातिब   कर ,
के  मेरा दिल  भी   है नाजुक,तेरे  बदन  की  तरहा !

पड़ी    हैं   सिलवटें    खुशबुओं   के    मकामों  पर,
हम  बे-नूर  हो गए  पतजड़  के  चमन  की  तरहा  ! 

पलकों  पे  आके  थम  गए ,आँसू  बरसते  थे  जो,
तड़पते रहे हम ,कुम्हलाये  हुए  सुमन  की  तरहा  !

चरचे  होते  रहते   हैं , अक्सर   गुलाबी  आँखों  के,
खूबसूरत   है  ये दिल, तेरे  हसीन  वदन की तरहा !

नकाब  से ढके  इस   चेहरे   को  हम पढ़ें  तो कैसे ?
छूना  चाहते  हैं ,तुम्हें  बहते हुए  पवन  की  तरहा  !

हर  मोड़  पर   मिल   जाते हैं , जमीं  से  जुड़े  हुए,
हमें  तो छा जाना  है, इस नील  गगन  की  तरहा !

आओ ; आ  भी जाओ ,  स्वागत   है   पलकों  पर, 
हम   खड़े  हैं , भूचाल  में   गिरे  सदन  की  तरहा  !
                                ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '












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