ग़ज़ल
ना बेरुखी से मुझे, इस तरह मुखातिब कर ,
के मेरा दिल भी है नाजुक,तेरे बदन की तरहा !
पड़ी हैं सिलवटें खुशबुओं के मकामों पर,
हम बे-नूर हो गए पतजड़ के चमन की तरहा !
पलकों पे आके थम गए ,आँसू बरसते थे जो,
तड़पते रहे हम ,कुम्हलाये हुए सुमन की तरहा !
चरचे होते रहते हैं , अक्सर गुलाबी आँखों के,
खूबसूरत है ये दिल, तेरे हसीन वदन की तरहा !
नकाब से ढके इस चेहरे को हम पढ़ें तो कैसे ?
छूना चाहते हैं ,तुम्हें बहते हुए पवन की तरहा !
हर मोड़ पर मिल जाते हैं , जमीं से जुड़े हुए,
हमें तो छा जाना है, इस नील गगन की तरहा !
आओ ; आ भी जाओ , स्वागत है पलकों पर,
हम खड़े हैं , भूचाल में गिरे सदन की तरहा !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
ना बेरुखी से मुझे, इस तरह मुखातिब कर ,
के मेरा दिल भी है नाजुक,तेरे बदन की तरहा !
पड़ी हैं सिलवटें खुशबुओं के मकामों पर,
हम बे-नूर हो गए पतजड़ के चमन की तरहा !
पलकों पे आके थम गए ,आँसू बरसते थे जो,
तड़पते रहे हम ,कुम्हलाये हुए सुमन की तरहा !
चरचे होते रहते हैं , अक्सर गुलाबी आँखों के,
खूबसूरत है ये दिल, तेरे हसीन वदन की तरहा !
नकाब से ढके इस चेहरे को हम पढ़ें तो कैसे ?
छूना चाहते हैं ,तुम्हें बहते हुए पवन की तरहा !
हर मोड़ पर मिल जाते हैं , जमीं से जुड़े हुए,
हमें तो छा जाना है, इस नील गगन की तरहा !
आओ ; आ भी जाओ , स्वागत है पलकों पर,
हम खड़े हैं , भूचाल में गिरे सदन की तरहा !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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