बाबा !
गैर से मोतियों की भीख ना मांग ,
अपनी झोली की कदर कर बाबा !
दिया है मुँह ,वो निवाला भी देगा,
तू दरवेश है, सबर कर बाबा !
हर दरवाजा बोल रहा ,इस नगरी में,
अपनी परिक्रम, को नजर कर बाबा !
फकीर ; तूफान का रुख मोड़ देते हैं ,
हवा-पानी-धूप से ,बसर कर बाबा !
तुझे तो रहनुमाई करनी है वक़्त की,
भड़कते शोलों को बे-असर कर बाबा !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
गैर से मोतियों की भीख ना मांग ,
अपनी झोली की कदर कर बाबा !
दिया है मुँह ,वो निवाला भी देगा,
तू दरवेश है, सबर कर बाबा !
हर दरवाजा बोल रहा ,इस नगरी में,
अपनी परिक्रम, को नजर कर बाबा !
फकीर ; तूफान का रुख मोड़ देते हैं ,
हवा-पानी-धूप से ,बसर कर बाबा !
तुझे तो रहनुमाई करनी है वक़्त की,
भड़कते शोलों को बे-असर कर बाबा !
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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