Monday, 22 January 2018

बाबा  !

गैर  से  मोतियों  की भीख ना  मांग ,
अपनी  झोली  की  कदर  कर  बाबा !

दिया  है  मुँह ,वो   निवाला भी देगा,
तू   दरवेश    है,    सबर   कर  बाबा !

हर दरवाजा बोल रहा ,इस नगरी में,
अपनी परिक्रम, को नजर कर बाबा !

फकीर ; तूफान का रुख मोड़ देते  हैं ,
हवा-पानी-धूप  से  ,बसर  कर बाबा !

तुझे तो रहनुमाई करनी है वक़्त की,
भड़कते शोलों को बे-असर कर बाबा !
                      ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '



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